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अपनों से मिला तिरस्कार, जीवन की सांझ में दर-दर भटक रही दो महिलाएं

अपनों से मिला तिरस्कार, जीवन की सांझ में दर-दर भटक रही दो महिलाएं

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नितेश सैनी/सुंदरनगर। मां-बाप बच्चों को उनकी खुशिया देने के लिए खुद कष्ट में रह कर जीते हैं। वे बच्चों की झोली में दुनिया भर की खुशियां डालने के लिए क्या-क्या नहीं करते पर कई बार वहीं बच्चे बुढ़ापे में माता पिता का सहारा तक नहीं बन पाते। जब मां बाप को बच्चों के सहारे की जरूरत होती है तो वे उन्हें दर-दर की ठोकरे खाने के लिए विवश कर देते हैं। ऐसा ही मामला सामने आया है सुंदरनगर में, जहां जैदेवी की दो महिलाएं जीवन की सांझ में दर-दर भटक रही है। जैदेवी पंचायत के बोढ़ल गांव निवासी 75 वर्षीय रंची देवी पत्नी स्वर्गीय कावरा और 76 वर्षीय बोढल निवासी चैत्री देवी ने सोचा भी नहीं  जीवन के इस पड़ाव में उन्हें ये  दिन देखने को मिलेंगे, जब घर बार सब कुछ छिन जाएगा। हालत है है कि दोनों के पास न तो  दो वक्त की रोटी है और न ही रहने के लिए कोई सहारा।

बीबीएमबी के खाली आवास  में ले रखी शरण

परिजनों के त्यागने के बाद वृद्ध महिलाओं ने एक दूसरे को सहरा बना लिया  और खंडहर हुई कालोनी दोनों के रहने का ठिकाना बनी है। दोनों वृद्धाओं ने  बीबीएमबी के खाली पड़े एक खंडहरनुमा आवास में शरण ले रखी है और मजबूरी में किसी तरह सर्द रातें गुजार रही है। लोगों से मिली रूखी सुखी खाकर पेट पाल रही। इसकी मदद के लिए अभी तक कोई आगे भी नहीं आ पाया है। रंची देवी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि इनके परिवार में बेटे और बहुएं भी हैं, जो बोढ़ल में ही रहते हैं। लेकिन कई वर्षों से इनकी किसी ने परवाह नहीं की। उन्होंने कहा कि जब शरीर चलता था, तो काम करके  ही रोटी खाती रही है। लेकिन कई साल से शरीर भी साथ नहीं दे रहा है, अब भारी और जोर का काम करने की क्षमता नहीं रही है। जिसके चलते लोग तो अनदेखी करते ही है, पर अपनों ने भी साथ नहीं दिया। बता दें कि दोनों महिलाएं सिर पर जलाने की लकड़ी जैदेवी से कॉलोनी में लाकर गुजारा करती थी। परिवार के त्यागने पर मजबूरन घर छोड़ कर कॉलोनी में आ गई है। उन्होंने कहा कि इन्हें नहीं पता कि कोई ऐसे भी संस्थान बने है, जहां समाज में तिरस्कार किए गए वृद्धों को आश्रय प्रदान करते हैं।

वृद्ध आश्रम में जगह दिलवाने के लिए लिखा पत्र

दूसरी ओर चैत्री देवी ने बताया कि उनके परिवार में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग होने पर  कोई नहीं पूछता है। जिसके चलते मजबूरी में इस मकान में ही रह रही है। उन्होंने कहा कि पंचायत प्रधान सोभा राम ने लिख कर एक पत्र दिया है ताकि किसी आश्रम में कोई जगह मिल पाए। वहीं सुंदरनगर के समाजसेवी उमेश भरद्वाज ने कहा कि दोनों महिलाएं बहुत वृद्ध है, इनके परिवार में इनकी देख भाल करने वाला भी कोई नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि समाज में इस तरह बुजुर्ग महिलाओं की मदद का आग्रह किया है और समाज में ऐसे लोगों के रहने के लिए उचित स्थान होना चाहिए।

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