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मन व्यवस्थित होगा…तभी चमक होगी

मन व्यवस्थित होगा…तभी चमक होगी

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कही अनकही/अनल पत्रवाल। दीपावली पर्व का दिन आ चुका है। घर के हर कोने में उजाला फैलाने से पहले उन्हें चमकाने के काम भी पूरा हो चुका है। यह सालाना काम है… यकीन मानिए कि यह काम किसी के जीवन की सबसे बड़ी लगन है।

  • सामान की छंटाई मन की भी मदद करती है। कितनी ही बार भावनाएं आड़े आती हैं और फैसला करना मुश्किल हो जाता है। सामान के साथ तो ऐसा बार-बार होता है। सफाई के समय तय करना ही पड़ता है कि क्या रखें और क्या जाने दें ।

यह जिंदगी के लिए भी एक तर्जुबा हो जाता है। जो लक्ष्य इनसे हासिल होता है, वह अदभुत है। साफ-सुथरा और व्यवस्थित यह शब्द ही बहुत bal-swach-abhiyan-1प्रबल है। इनका स्थान घर के कोने-कोने में हो तो मन पर असर करेगा और जीवन पर भी। तब यह हमारी सोच की राह में उलझनें कम करेगा। हम जो बात यहां करने जा रहे हैं यही बातें  हमने कुछ नवरात्र पर भी की थीं, यहां अंतर यह है कि तब हम एक नई शुरुआत की बात कर रहे थे।

  • आज उजाला फैलाने से पहले की चमक की बात कर रहे हैं। बीते कुछ दिनों से हम जीवन के हर कोने में चमक लाने की कोशिश में जुटे रहे। क्या हम इस चमक को आज शाम तक बरकरार रख पाएंगे।

जरूर, पर घर के अंदर ही अंदर, फिर बाहर क्यों नहीं?  यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है, कि जब हम घर की चमक को बरकरार रख सकते हैं तो बाहर क्यों नहीं ? इस चमक के बीच हम जो खुशनुमा माहौल में पटाखे फोड़ने का काम करेंगे, उससे जो कचरा निकलेगा क्या उसे भी उसी शिद्दत से साफ करेंगे, जैसा कि घर के भीतर करते हैं ? इस शुरुआत के लिए लचर नियमों की तोड़-फोड़ और नए नियमों का निर्माण करना होगा। यह जरूरी है कि जो भी काम किया जाए उसमें पूरी इच्छा शामिल हो। फिर जो लक्ष्य इससे हासिल होगा वह अदभुत होगा। एकदम नया रोडमैप तैयार होगा। साफ-सुथरा और व्यवस्थित।bal-swach-abhiyan-2 वैसे साफ-सुथरा और व्यवस्थित यह शब्द ही बहुत प्रबल है और हमारी जिंदगी में बहुत महत्व रखता है। अगर किसी भी काम में खरा उतरना है, तो क्यों न शुरूआत यहीं से करें। मन व्यवस्थित होगा तो काम भी अच्छा होगा। अगर काम को नए सिरे से शुरू करना है तो काट-छांट तो करनी ही पड़ेगी। यही काट-छांट तो हमें आज शाम को करनी है। हमें यह चमक तभी मिल सकेगी अगर हम घर के भीतर से लेकर बाहर तक के कचरे को भी उसी मन से साफ करेंगे।

यह अलग बात है कि हम सबका यह हाल है कि अगर स्वर्ग में भी पहुंच जाएं, तो कहेंगे यही कि स्वर्ग तो है मगर खुशियों पर यकीन कम आता है। संदेह के साए मंडराते रहते हैं…जो पाया उस पर जाहिर है। जो पा सकते हैं उसकी कुव्वत पर भी। जो पाया उस पर भी यकीन न करना ,जहां नेमत की बेकद्री है, वहीं खुद की काबलीयत पर शुबह कमजोरी की निशानी है। संतुलन कहां है… ? संतुलन यानी हासिल का यकीन और काबलीयत का इत्मीनान। कहने का मतलब यह है कि हमारा मन व्यवस्थित होना चाहिए तभी यह उजाले बने रहेंगे। इसलिए हमेशा इस बात को याद रखना होगा कि अगर मन व्यवस्थित होगा तो यह उजालों की चमक भी बराबर बनी रहेगी।

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