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मन व्यवस्थित होगा…तभी चमक होगी

जब हम घर की चमक को बरकरार रख सकते हैं तो बाहर क्यों नहीं

मन व्यवस्थित होगा…तभी चमक होगी

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दीपावली पर्व (Diwali Festival)का दिन आ चुका हैं। घर के हर कोने में उजाला फैलाने से पहले, उन्हें चमकाने के काम पूरा हो चुका हैं। यह सालाना काम है। यकीन करो कि यह काम किसी के जीवन की सबसे बड़ी लगन है। सामान की छंटाई, मन की भी मदद करती है। कितनी ही बार भावनाएं आड़े आती हैं और फैसला करना मुश्किल हो जाता है। सामान के साथ तो ऐसा बार-बार होता है। सफाई के समय तय करना ही पड़ता है तो जिंदगी के लिए भी एक तर्जुबा हो जाता है। जो लक्ष्य इनसे हासिल होता है,वो अद्भुत है। साफ-सुथरा और व्यवस्थित यह शब्द ही बहुत प्रबल है, इनका स्थान घर के कोने-कोने में हो,तो मन पर असर करेगा और जीवन पर भी। तब यह सोच की राह में उलझने कम करेगा। हम जो बात यहां करने जा रहे हैं यही बातें नवरात्र पर भी कुछ-कुछ की थी,यहां अंतर यह है कि तब हम एक नई शुरुआत की बात कर रहे थे,आज उजाला फैलाने से पहले चमक की बात कर रहे हैं। बीते कुछ दिनों से हम जीवन के हर कोने में चमक लाने की कोशिश में जुटे रहे,क्या हम इस चमक को आज शाम तक बरकरार रख पाएंगे। जरूर,पर घर के अंदर ही अंदर,फिर बाहर क्यों नहीं। यहीं से यह प्रश्न खडा होता है कि जब हम घर की चमक को बरकरार रख सकते हैं तो बाहर क्यों नहीं। इस चमक के बीच हम जो खुशनुमा माहौल में पटाखे फोड़ने का काम करेंगे,उससे जो कचरा निकलेगा क्या उसे भी उसी शिद्दत से साफ करेंगे,जैसा कि घर के भीतर।

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इस शुरुआत के लिए लचर नियमों की तोड़-फोड़ और नए नियमों का निर्माण करना होगा। यह जरूरी है कि जो भी काम किया जाए उसमें पूरी इच्छा शामिल हो। फिर जो लक्ष्य इससे हासिल होगा वह अद्भुत होगा। एकदम नया रोडमैप तैयार होगा…. साफ-सुथरा और व्यवस्थित। वैसे साफ-सुथरा और व्यवस्थित यह शब्द ही बहुत प्रबल है और हमारी जिंदगी में बहुत महत्व रखता है। अगर किसी भी काम में खरा उतरना है,तो क्यों न शुरुआत यहीं से करें। मन व्यवस्थित होगा तो काम भी अच्छा होगा। अगर काम को नए सिरे से शुरू करना है तो काट-छांट तो करनी ही पड़ेगी। यही काट-छांट तो हमें आज शाम को करनी है। हमें यह चमक तभी मिल सकेगी अगर हम घर के भीतर से लेकर बाहर तक के कचरे को भी उसी मन से साफ करेंगे।

यह अलग बात है कि हम सबका यह हाल है कि अगर स्वर्ग में भी पहुंच जाएं, तो कहेंगे यही कि स्वर्ग तो है मगर…। खुशियों पर यकीन कम आता है, संदेह के साए मंडराते रहते हैं, जो पाया उस पर जाहिर है, जो पा सकते हैं उसकी कुव्वत पर भी। जो पाया उस पर भी यकीन ना करना, जहां नेमत की बेक्रदी है,व हीं खुद की काबिलियत पर शुबाह कमजोरी की निशानी है। संतुलन कहां है। संतुलन यानी हासिल का यकीन और काबिलियत का इत्मीनान। कहने का मतलब यह है कि हमारा मन व्यवस्थित होना चाहिए तभी यह उजाले बने रहेंगे। इसलिए हमेशा इस बात को याद रखना होगा कि अगर मन व्यवस्थित होगा तो यह उजालों की चमक भी बराबर बनी रहेगी।

-डॉ राजेश शर्मा

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