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श्राद्ध के दिनों भूल कर भी न करें ये गलतियां

श्राद्ध के दिनों भूल कर भी न करें ये गलतियां

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हिंदू धर्म में मनुष्य के ऊपर तीन तरह के ऋण बताए गए हैं। देव, ऋषि तथा पितृ ऋण और इन सभी में पितृ ऋण के निवारण के लिए 15 दिनों के पितृ पक्ष में पितृ यज्ञ करने यानी श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के समय को पितृ पक्ष कहा जाता है और इसी 15 दिनों के अंदर श्राद्ध कर्म कर पितरों को जलदान, पिंड दान की प्रक्रिया की जाती है। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा धरती पर आती है और अपने परिजनों के साथ रहती हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और तर्पण करने से पितरों को शांति और मुक्ति मिलती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया कि पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जानी जाती है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों या पितरों की पुण्यतिथि का सही दिन ज्ञात नहीं होता है। ऐसे पूर्वजों को इस दिन श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित कर याद किया जाता है। श्राद्ध के दिनों में कुछ कार्य वर्जित होते हैं, जिनको नहीं करना चाहिए …

  • श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दाल, बडे, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिंडी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है। आलू, मूली, बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है।
  • पितृपक्ष में ब्रह्राचर्य के व्रत का पालन करना चाहिए। साथ ही पूरे पितृपक्ष में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को पान, दूसरे के घर पर खाना और शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में कोई भी शुभ कार्य या नयी चीजों की खरीददारी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि पितृपक्ष शोक व्यक्त करने का समय होता है।

  • श्राद्ध करने के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे शास्त्रों में बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र और अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान देने के पात्र होते हैं। पितृपक्ष में पुरुषों को दाढ़ी मूंछ नहीं कटवाना चाहिए। श्राद्ध के पिंडों को गाय, ब्राह्राण और बकरी को खिलाना चाहिए।
  • श्राद्ध का समय हमेशा जब सूर्य की छाया पैरो पर पड़ने लग जाए यानी दोपहर के बाद ही शास्त्र सम्मत है। सुबह-सुबह अथवा 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है।
  • श्राद्ध पक्ष में कभी भी लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इन दिनों पत्तल पर स्वयं और ब्राह्राणों को भोजन करवाना उत्तम माना गया है।

  • चतुर्दशी को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। लेकिन जिस किसी की युद्ध में मृत्यु हुई हो उनके लिए चतुर्दशी का श्राद्ध करना शुभ माना जाता है। किसी दूसरे व्यक्ति के घर या जमीन पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। हालांकि जंगल, पहाड़, मंदिर या पुण्यतीर्थ किसी दूसरे की जमीन के तौर पर नहीं देखे जाते हैं क्योंकि इन जगहों पर किसी का अधिकार नहीं होता है, इसलिए यहां श्राद्ध किया जा सकता है।
  • पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं गले में दाये कंधे मे जनेउ डाल कर और दक्षिण की ओर मुख करके की जाती है। कई ऐसे पितर भी होते है जिनके पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतान हीन होते हैं। ऐसे पितरों के प्रति आदर पूर्वक अगर उनके भाई भतीजे, भांजे या अन्य चाचा ताउ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पितर की आत्मा को मोक्ष मिलता है।
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