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कलंक चतुर्थी : इस दिन भूल कर भी न करें चंद्रमा के दर्शन, नहीं तो भुगतना होगा भयंकर दंड

कलंक चतुर्थी : इस दिन भूल कर भी न करें चंद्रमा के दर्शन, नहीं तो भुगतना होगा भयंकर दंड

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शास्त्रों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को कलंक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना निषेध माना गया है क्योंकि इस गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा के दर्शन करने से किसी को भी कलंक लग सकता है। कहते हैं गणेश जी ने चंद्रमा को शापित किया था। पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन कैलाश पर ब्रह्मदेव महादेव के दर्शन के लिए गए तभी वहां देवर्षि नारद ने प्रकट होकर एक अत्यंत स्वादिष्ट फल भगवान शंकर को अर्पित किया।


कार्तिकेय व गणेश दोनों महादेव से उस फल की मांग करने लगे। तब ब्रह्मदेव ने महादेव से कहा कि फल को छोटे कार्तिकेय को दे दें। अत: महादेव ने वह फल कार्तिकेय को दे दिया। इससे गजानन ब्रह्मदेव पर क्रोधित होकर उनकी सृष्टि रचना के कार्य में विघ्न डालने लगे। गणपति के उग्र रूप के कारण ब्रह्म देव भयभीत हो गए। इस दृश्य को देखकर चंद्रमा हंस पड़े। चंद्रमा की हंसी सुन कर गणेश जी क्रोधित हो उठे तथा उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया। श्राप के अनुसार चंद्रदेव किसी को देखने के योग्य नहीं रहें और कोई उन्हें देखे भी तो वह पाप का भागी हो जाता। निराश चंद्र ने बारह वर्ष तक गणेश जी की तपस्या की जिससे गणपति ने प्रसन्न होकर चंद्र देव के श्राप को कम कर दिया। इसके अनुसार मात्र भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो व्यक्ति चंद्रमा को देखता है, वह निश्चय ही अभिशाप का भागी होता है तथा उस पर झूठा कलंक लगता है।

भगवान श्री कृष्ण पर द्वारकापुरी में सूर्य भक्त सत्राजित ने स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगाया था। स्कंदपुराण में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि भाद्रपद के शुक्लपक्ष के चंद्र दर्शन मैंने गोखुर के जल में किया जिसके फलस्वरूप मुझ पर मणि की चोरी का कलंक लगा “मया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चंद्रदर्शनं गोष्पदाम्बुनि वै राजन् कृतं दिवमपश्यता”। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रदर्शन से कलंक लगने के शमन हेतु विष्णुपुराण में स्यमंतक मणि कथा का उल्लेख है जिसके सुनने या पढऩे से यह दोष समाप्त होता है।

स्यमंतक मणि की कथा

द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने सूर्य नारायण की आराधना की तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक मणि अपने गले से उतारकर दे दी। यह मणि जहां भी होती थी वहां दैवी आपदाएं नहीं आती थीं। मणि गले में पहन कर वह कृष्ण से मिलने गया। अत्यंत तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान नहीं सके। सभी ने सोचा सूर्यदेव आए हैं । उन लोगों ने कृष्ण से जाकर कहा साक्षात सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं। कृष्ण उस समय चौसर खेल रहे थे उन्होंने हंस कर कहा, वह सूर्य नहीं सत्राजित है जिसने सूर्यदेव की मणि धारण कर रखी है। श्रीकृष्ण ने मणि को राज्य के भले के लिए उससे मांगा। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहां एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।

जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है। दुःखी हो कर श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मारे जाने और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा के भीतर चले गए। वहां उन्होंने जामवन्त की पुत्री के पास मणि को देखा। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे कृष्ण को मृत जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह सोचकर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

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