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ऐसी क्या मजबूरी जो पहाड़ों पर पत्थर तोड़ती रही लोकगायिका ? जानें

ऐसी क्या मजबूरी जो पहाड़ों पर पत्थर तोड़ती रही लोकगायिका ? जानें

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नई दिल्ली। पहाड़ी इलाकों में लोकगीतों का काफी चलन होता है, लेकिन समय के साथ साथ इन पहाड़ी लोकगीतों पर अधुनिकता के कारण खतरा मंडराने लगा है। ‘आज पनि जौं-जौं, भोल पनि जौं-जौं…’ गीत से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने वालीं मशहूर लोकगायिका कबूतरी देवी का हाल ही में निधन हुआ। अपने गीतों के वजह से दुनिया भर में मशहूर होने के बावजूद भी कबूतरी का जीवन संघर्ष उत्तराखंड की आम महिलाओं जैसा ही दूभर रहा। कबूतरी जिन हाथों से साज बजाती थीं, उन्हीं हाथों से पत्थर भी तोड़ती थीं।


दरअसल कबूतरी का जन्म यहां स्थित एक बंद समाज और शिल्पकार (दलित) जाति में हुआ था। इस जाति के लोगों की आजीविका का पारंपरिक साधन खेतिहर मजदूरी, पत्थर तोड़ना, भवन निर्माण, कृषि यंत्र और औजार बनाना और ऋतुओं के त्योहारों, शादियों और दूसरे उत्सवों में नृत्य और गायन रहा है। कबूतरी ने सात साल की उम्र से ही गायन सीख लिया था।


जिसके बाद कम उम्र में शादी हो जाने के बाद उनके पति दीवानी राम उनके लिए गीत लिखते थे और वह विभिन्न मंचों पर उन्हें गाती थीं। वही उन्हें आकाशवाणी तक भी ले गए। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी ने गायन को अपना पूर्णकालिक पेशा नहीं बनाया, शायद इसलिए उन्हें इतना नाम नहीं मिला। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने उत्तराखंड के सीमांत जिले- पिथौरागढ़ के अपने घर में रहकर मजदूरी करके अपने परिवार को पालने लगीं।

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