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हिमाचल का ये कर्मयोगी बनना था प्रोफेसर, बन गए लीडर

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वीरभद्र सिंह की दिली इच्छा थी कि वे दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनें। इतिहास में प्रथम श्रेणी में एमए करने के बाद वे इस बारे में प्रयास कर रहे थे, लेकिन किसे पता था कि राजनीति का मैदान बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहा है। नियति उन्हें राजनीति में खींच लाई। लाल बहादुर शास्त्री वीरभद्र सिंह को इंदिरा गांधी के पास लेकर गए। लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने उनकी पंडित नेहरू से बातचीत करवाई। टिकट के लिए बिना आवेदन किये कांग्रेस ने 1962 के लोकसभा चुनाव में उन्हें महासू निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया। अपने पहले ही चुनाव में जीत के साथ उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। उनको केंद्र की राजनीति से हटाने की बात भी महज संयोग ही है। 1983 में जब वीरभद्र सिंह लोकसभा सांसद और केंद्र में राज्यमंत्री थे, उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के मुखिया का पद संभालने की जिम्मेदारी दी। उस समय इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘ मैं आपको अवसर दे रही हूं, खोना मत।’ आधी सदी से ज्यादा के राजनीतिक जीवन में विभिन्न उपलब्धियों को लेकर जहां वे सुर्ख़ियों में रहे, वहीं विवादों ने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। सागर कत्था मामला, डीसी मामला और आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के मामले में उनका नाम जोड़ा गया, लेकिन वे पहले दो मामलों में बेदाग़ साबित हुए जबकि तीसरा अभी न्यायलय में विचाराधीन है। खुद पर लगे आरोपों को वीरभद्र सिंह अपने राजनीतिक विरोधियों का षड्यंत्र करार देते रहे।


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