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विघ्नों का नाश करते हैं गणपति

विघ्नों का नाश करते हैं गणपति

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गणेश जी भगवान शिव और पार्वती के पुत्र हैं गणों के स्वामी होने के कारण उन्हें गणपति भी कहा जाता है। इन्हें केतु का देवता माना जाता है। मान्यता है कि संसार में जो भी साधन हैं उसके स्वामी गणेश जी ही हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण वे गजानन हैं और किसी भी शुभकार्य में पहले इनका पूजन होने से ये आदि पूज्य हैं।

गणपति आदि देव हैं शिवमानस पूजा में गणेश को प्रणव (ऊँ) कहा जाता है। उनकी चार भुजाएं चार दिशाओं की प्रतीक हैं। चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है इसलिए वे लंबोदर हैं। बड़े कान अधिक ग्राह्य शक्ति व छोटी पैनी आंखें सूक्ष्म दृष्टि की सूचक हैं। उनकी सूंड महा बुद्धत्व की प्रतीक है। गणेश को जन्म न देते हुए माता पार्वती ने उनके शरीर की रचना की। उस समय उनका मुख सामान्य था। गणेश की रचना के बाद माता ने उनको घर की पहरेदारी करने का आदेश दिया। माता ने कहा कि जब तक वह स्नान कर रही हैं तब तक के लिये गणेश किसी को भी घर में प्रवेश न करने दें। तभी द्वार पर भगवान शंकर आए और बोले -पुत्र यह मेरा घर है मुझे प्रवेश करने दो। गणेश के रोकने पर प्रभु ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया। गणेश को भूमि में निर्जीव पड़ा देख माता पार्वती व्याकुल हो उठीं। तब शिव को उनकी त्रुटि का बोध हुआ और उन्होंने गणेश के धड़ पर गज का सर लगा दिया। साथ ही उनको प्रथम पूज्य का वरदान भी मिला इसीलिए सर्वप्रथम गणेश की पूजा होती है।

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मूषक वाहन बना

प्राचीन समय में सुमेरु पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहां आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया। कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और कांपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख मांगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा ‘तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा।
कांपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की- दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें। ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे, तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तु हारा स मान करने लगेंगे। फिर मूषक गणेश जी का वाहन बन गया

ganeshगणेश चतुर्थी पूजा

हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास की चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश जी का आविर्भाव हुआ था। 
इस महापर्व पर लोग प्रात: काल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। पूजन के पश्चात् नीची नजर से चंद्रमा को अघ्र्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है। मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए।

इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय तुम्हारी पूजा करने के पश्चात व्रती चंद्रमा को अध्र्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान्न खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्षपर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

गणेश स्तवन से लक्ष्मी

वैसे तो हर गणेश चतुर्थी लाभकारी होती है पर अगर भाद्रपद शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी के दिन से लेकर दूसरे वर्ष की भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी तक पूरे बारह मास प्रतिदिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर एक धोती और एक उत्तरीय वस्त्र दुपट्टे जैसा ओढ़ कर किसी एकांत कमरे में पवित्र आसन पर बैठ कर गणेश जी का ध्यान करते हुए 108 दानों वाली माला से सात बार इस चौपाई का पाठ करें। इससे धन लाभ होगा।
ganeshhaaaगाइए गणपति गजवंदन,संकर सुवन भवानी नंदन
सिद्धि सदन गज बदन विनायक,कृपासिंधु सुंदर सब लायक
मोदक प्रिय मुद मंगल दाता,विद्या वारिधि बुद्धि विधाता
मांगत तुलसिदास कर जोरे, बसहिं राम सिय मानस मोरे
प्रतिदिन इसी मंत्र का जप सात माला करें ।

गणपति कृपा

ऊँ हस्तिपिशाचिनी खे स्वाहा
यह मंत्र जूठे मुंह किया जाता है इस लिए कुछ खा कर ही मंत्र जप करना चाहिए। मात्र इस मंत्र के प्रभाव से विघ्न दूर होते हैं। साधक पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के बैठकर प्रतिदिन 21 माला मंत्रजप करें। एक माह में मंत्र सिद्ध हो जाता है। जप की समाप्ति पर देवता की प्राण प्रतिष्ठा कर प्रतिदिन मधु से स्नान करा कर गुड़ की खीर अर्पित करें।

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