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बुद्धं शरणं गच्छामि…धम्मं शरणं गच्छामि…

बुद्धं शरणं गच्छामि…धम्मं शरणं गच्छामि…

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भगवान बुद्ध के जीवन का अवलोकन करें तो यह अत्यंत रहस्यमय दिखता है बल्कि यों कहें कि पूरे बुद्ध ही रहस्यमय हैं। आश्चर्य यह कि आध्यात्मिक चेतना के जिस स्तर को उन्होंने छुआ उतना किसी और ने नहीं। सत्य की खोज में अपना पूरा जीवन लगा देना और अंततः निर्वाण के रूप में मुक्ति पाना। यही बुद्ध के पूरे जीवन का निचोड़ है। जाने कितने ग्रंथ उनके प्रवचनों से भरे पड़े हैं पर कहीं भी दोहराव नहीं दिखाई देता। गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं। यह धर्म भारत की श्रमण परंपरा से निकला धर्म और दर्शन है और आज संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है।

इस महान दार्शनिक विचारक का जन्म नेपाल के लुंबिनी में ईसा पूर्व 563ई. में हुआ। वह दिन वैशाख पूर्णिमा का था, उनकी माता माया देवी कपिलवस्तु की महारानी थीं तथा उनके पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे। वह अपने मायके जा रही थीं तभी लुंबिनी वन में बुद्ध का जन्म हुआ। जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। उन्हें उनकी मौसी गौतमी ने पाला। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। पिता ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा पर वे संन्यासी बन गए। हालांकि उनका विवाह भी हुआ और एक पुत्र भी पर सत्य की खोज के लिए गृहत्याग दिया।


गृहत्याग करने के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे। उनके मन में शांति नहीं थी। बिंबिसार, उद्रक, आलार एवं कालाम नामक सांख्योपदेशकों से मिलकर वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली में जा पहुंचे। वहां उन्हें कौंडिल्य आदि पांच साधक मिले। उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर साधना प्रारंभ कर दी। किंतु उसमें असफल होने पर वे गया के निकट एक वट वृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्थ रहूंगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूं। सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत हो गये।

जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी ‘बोधिवृक्ष’ के नाम से विख्यात है। ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था 35 वर्ष थी। ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘तपस्सु’ तथा ‘काल्लिक’ नामक दो शूद्र उनके पास आये। महात्मा बुद्ध नें उन्हें ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रथम अनुयायी बनाया। कुशी नगर भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण स्थान है उनके अंतिम शब्द थे –हे भिक्षुओ आज मैं तुमसे इतना ही कहता हूंकि जितने भी संस्कार हैं वे सब नाश होने वाले हैं इसलिए प्रमादरहित होकर अपना कल्याण करो । मृत्यु के समय उनकी अवस्था 80 वर्ष की थी।

महानिर्वाण मंदिर कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण है। इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की 6.10 मीटर लंबी प्रतिमा स्थापित है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह सुंदर प्रतिमा चुनार के बलुआ पत्थर को काटकर बनाई गई थी। प्रतिमा के नीचे खुदे अभिलेख के पता चलता है कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर ले आया था। गौतम बुद्ध ने कुशीनगर में ही निर्वाण प्राप्त किया था।

कुशीनगर उत्तर प्रदेश में है यहां कई प्राचीन स्तूप और मठ स्थित हैं। इनमें से कई स्थानों का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने कराया था। प्राचीन कुशीनगर खंडहर में तब्दील हो गया था, लेकिन 19वीं सदी में इस शहर को खोज निकाला गया।कुशीनगर में ही भगवान बुद्ध ने महा परिनिर्वाण प्राप्त किया था। यहां एक महापरिनिर्वाण मंदिर भी है साथ ही एक निर्वाण स्तूप भी है। “रामभर स्थल” पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। हर वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक मेला लगता है। यहां एक शानदार बौद्ध संग्रहालय भी है जिसमें कई बौद्ध वस्तुओं को रखा गया है। इन वस्तुओं का अध्ययन करने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं।

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