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मां सरस्वती का दूसरा स्वरूप है माता सिद्धिदात्री

कमल पुष्प पर भी विराजमान है मां

मां सरस्वती का दूसरा स्वरूप है माता सिद्धिदात्री

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नवरात्र के अंतिम दिन मां दुर्गा के स्वरूप सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इन आठ सिद्धियों को भगवान शिव ने देवी की कृपा से प्राप्त की थी। जिसे पाकर शिव जी का आधा शरीर देवी का हो गया था तभी से ये रूप शिव अर्द्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। इनकी पूजा करने से लौकिक और पारलौकिक ये सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति होती है। चार भुजाओं वाली माता सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है, ये कमल पुष्प पर भी विराजमान रहती है। इनकी दायें ओर की नीचे वाली भुजा पर चक्र सुशोभित है तो ऊपर वाली भुजा में गदा। इसके अलावा बांयी तरफ के नीचे वाली भुजा में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमलपुष्प पकड़े हुए हैं।


 


मां सिद्धिदात्री को मां सरस्वती का दूसरा स्वरूप भी माना जाता है। जो श्वेत वस्त्रों के साथ मधुर स्वर और महाज्ञान से भक्तों को सम्मोहित करती है। आज के दिन सिद्धियों वाली भगवती सिद्धिदात्री को मनाने से साधक का निर्वाण चक्र जागृत होता है। दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। हवन से पूर्व सभी देवी-देवताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी आहुति देनी चाहिए। बाद में माता के नाम से आहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्रः ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार आहुति दें।



मूल मंत्र

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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