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मंडी के बागवान हेमराज ने सघन खेती मॉडल को अपना कमाए लाखों

मंडी के बागवान हेमराज ने सघन खेती मॉडल को अपना कमाए लाखों

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मंडी। मिट्टी से सोना उगाने का हुनर रखने वाले लोग खेती में नयापन लाकर केवल पैसा ही नहीं कमाते हैं बल्कि दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन जाते हैं। ऐसे ही एक बागवान हैं मंडी जिले की पांगणा उप-तहसील के गांव मरोठी (Marothi) के निवासी हेमराज गुप्ता।


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हेमराज ने सेब की खेती के पुराने तरीके को छोड़कर बागवानी विभाग के सघन खेती मॉडल को अपनाया और आज उनकी सफलता की कहानी पूरे इलाके के लिए प्ररेणा का सबब है। वे बताते हैं कि सघन खेती में पुरानी फसल के एक पेड़ की जगह रूट स्टॉक के 15 से 20 पौधे लगते हैं, इससे दुगनी फसल और दुगनी आमदनी होती है।


5 बीघा से कमाए 5 लाख

हेमराज गुप्ता खेती में नई तकनीकें अपनाने और नवीन प्रयोगों को आजमाने की तरफदारी करते हुए कहते हैं कि पुराने तरीके से सेब की खेती पर उनके पांच बीघा बगीचे से 60 से 70 बक्से निकलते थे, फिर उन्होंने सघन खेती के मॉडल को अपनाया और पुराने बगीचे का सुधार किया। पांच बीघा जमीन पर बागवानी विभाग द्वारा उपलब्ध करवाए उन्नत नस्ल के सेब के करीब एक हजार पौधे लगाए और इससे बगीचे से सेब के 200 बक्से निकले, औसतन 2500 रुपए प्रति बक्से के हिसाब से उन्हें मौजूदा सीजन में लगभग 5 लाख रुपए की आमदनी हुई है।


सघन खेती से उन्हें सेब के पौधों के अतिरिक्त पौधों के बीच की भूमि पर मौसमी सब्जियां व दालें उगाकर भी लाभ मिल रहा है।वे बताते हैं कि उन्होंने अपने यहां पास के गांव के 2 लोगों को खेती में मदद के लिए स्थाई रोजगार दे रखा है। सेब के सीजन में तो वे 10 लोगों को रोजगार देते हैं। उनका कहना है कि सेब की परंपरागत खेती की अपेक्षा क्लोनल रूट स्टॉक पर तैयार बगीचों में 2 से 3 सालों में फल लगना शुरू हो जाते हैं, जबकि सेब की पुराने तरीके की खेती के बगीचों में फल आने में 10 से ज्यादा साल लग जाते हैं।

हेमराज आगे बताते हैं कि उन्हें बागवानी विभाग से जो उन्न्त नस्ल के पौधे मिले हैं उनके फल का आकार और रंग विदेशी फसल के मुकाबले का है। इसमें प्राकृतिक रूप से ही फल का रंग निखरा होता है जिससे रंग के लिए किसी प्रकार के स्प्रे की जरूरत नहीं पड़ती। बाजार में इनके दाम भी अच्छे मिलते हैं। इसके अलावा सरकारी मदद से बगीचे में वर्मी कम्पोस्ट भी बना लिया है जिससे घरेलू खाद तैयार कर बागवानी में मदद मिल रही है।


हर प्रकार से की जा रही बागवानों की मदद

करसोग के सहायक बागवानी विकास अधिकारी युवराज वर्मा बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना के तहत करसोग क्षेत्र में 150-150 बीघा के 9 क्लस्टर बना गए हैं। इनमें बागवानों को सरकार की ओर से उन्नत नस्ल के पौधे, खेती की नई तकनीक एवं विधि की जानकारी एवं प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, मल्चिंग शीट, ऐंटी हेल नैट, टपक (ड्रिप) सिंचाई व पानी टैंक, की व्यवस्था में मदद दी जाती है।

बागवानी विभाग मंडी के उपनिदेशक अमर प्रकाश कपूर का कहना है कि विभाग पुराने बगीचों के जीर्णोद्धार के लिए मदद कर रहा है। पुराने पौधों को हटाने का आधा खर्च सरकार वहन करेगी साथ ही नए पौधे लगाने के लिए भी प्रति एक हैक्टेयर पर करीब 85 हजार रुपए सब्सिडी का प्रावधान है। उन्होंने बताया कि जिला के लिए सेब के क्लोनल रूट स्टॉक पौधे विदेश से लाए गए हैं। इनसे सेब उत्पादन में तीन से चार गुणा बढ़ोतरी की जा सकती है। जिला में सेब के 22 हजार क्लोनल रूट स्टॉक पौधे बांटे जा चुके हैं। इसके अलावा करीब 47 हजार और क्लोनल रूट स्टॉक पौधे विभाग की नर्सरियों में लगाए गए हैं।


क्या है सेब की सघन खेती

उपनिदेशक अमर प्रकाश कपूर बताते हैं कि सेब की सघन खेती में क्लोनल रूट स्टॉक के बौने और मध्यम बौने पौधे आपस में कम दूरी पर लगाए जाते हैं, इससे भूमि का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता है। इसमें जहां कम भूमि पर अधिक पौधे लग जाते हैं वहीं पौधों के बीच की भूमि पर अन्य खेती की जा सकती है, जिससे अधिक लाभ होता है। डीसी ऋग्वेद ठाकुर का कहना है कि मंडी जिले में बागवानी गतिविधियों को नई गति देने के प्रयास किए जा रहे हैं। बागवानी पैदावार बढ़ाने और इससे जुड़े कार्यों को मुनाफे वाला बनाकर किसानों की आय दुगनी करने के लिए कदम उठाए गए है। फलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए बागबानों को क्लोनल रूट स्टॉक और फलदार पौधों की उन्नत किस्मों का प्लांटिंग मैटिरियल प्रदान करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इससे जिले में बागवानी की मौजूदा स्थिति में व्यापक सुधार और मजबूती आएगी।

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