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लंका दहन के साथ #Kullu_Dussehra संपन्न, भगवान रघुनाथ से विदाई लेकर देवी-देवता लौटे

माता हिंडिंबा व राजपरिवार के सदस्यों ने निभाई लंका दहन की रस्म

लंका दहन के साथ #Kullu_Dussehra संपन्न, भगवान रघुनाथ से विदाई लेकर देवी-देवता लौटे

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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला के ऐतिहासिक ढालुपर मैदान में 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा (International Kullu Dussehra) लंका दहन के साथ ही आज समाप्त हो गया है। इस दौरान भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में एक दर्जन देवी-देवताओं ने भाग लिया। अस्थाई शिविर से भगवान रघुनाथ लाव लश्कर के साथ रथ में सवार हुए। विधिवत पूजा अर्चना के साथ लंका दहन के लिए माता हिंडिंबा की अगुवाई में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। लंका दहन के लिए रथयात्रा (Rath yatra) पशु मैदान के अंतिम छोर पर पहुंची, जिसके बाद माता हिंडिंबा व राज परिवार के सदस्यों ने ब्यास तट पर लंका दहन की परंपरा का निर्वहन किया। लंका दहन (Lanka Dahan) के बाद देवी देवताओं ने भगवान रघुनाथ (Lord Raghunath) से विदाई ली। इसके साथ ही पशु मैदान से रथयात्रा वापस रथ मैदान पहुंची। रथ मैदान से भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर रघुनाथपुर अपने मंदिर लौटे। जिसके बाद देवी देवताओं ने भी अपने अपने गांव की और कूच किया।

 

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भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह (Maheshwar Singh) ने बताया कि 7 दिवसीय दशहरा उत्सव में सभी परंपराओं को निभाया गया है और लंका दहन के साथ ही आज अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा संपन्न हो गया है। बता दें कि पूरे देश में एकमात्र कुल्लू दशहरा उत्सव में रावण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं। यहां पर लंका दहन की प्राचीन परंपरा (Ancient tradition) का निर्वहन किया जाता है और ब्यास नदी के किनारे लंका वेकर में जाकर बाबड़ी के पास सभी प्राचीन रस्में निभाई जाती हैं। आपको बता दें कि कोरोना (Corona) महामारी के चलते इस बार अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा रस्म अदायगी के साथ ही मनाया गया। अधिकांश देवताओं को दशहरे का आमंत्रण नहीं दिया गया था, हालांकि दशहरा उत्सव के दौरान कुछ नाराज देवताओं ने रघुनाथ के अस्थाई शिविर में हाजिरी लगाई और दशहरा उत्सव में ना बुलाए जाने पर अपनी नाराजगी जताई।

 

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