सियासी हलचलः अरसे बाद गले मिले वीरभद्र-सुखराम, क्या दिल भी मिले

धुर विरोधियों को मिलाने में कड़ी बने सुखराम के पोते आश्रय

सियासी हलचलः अरसे बाद गले मिले वीरभद्र-सुखराम, क्या दिल भी मिले

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चुनाव डेस्क/ कांगड़ा। सत्ता की सियासत कब क्या रंग दिखा दे पता ही नहीं चलता है। हिमाचल की राजनीति (Himachal Politics) में इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा है। एक के बाद एक सियासी घटनाएं सामने आ रही हैं। वह भी हिमाचल के बाहर नई दिल्ली (New Delhi) में। पहले नई दिल्ली में पंडित सुखराम व उनके पोते आश्रय शर्मा ने कांग्रेस का हाथ थामा। फिर आश्रय शर्मा पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह (Virbhadra singh) से मिले।


 

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आश्रय और वीरभद्र सिंह की मुलाकात के एक दिन बाद धुर विरोधी माने जाने वाले पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह व पंडित सुखराम (Pandit Sukhram) अरसे बाद गले मिले। यह दोनों दिग्गज नेता गले तो मिले हैं, लेकिन क्या दिल भी मिले हैं, यह देखना बाकी है। पंडित सुखराम को पोते का प्रेम वीरभद्र सिंह की चौखट तक ले गया। वहीं, हाईकमान के फैसले के आगे वीरभद्र सिंह ने भी गले मिलकर सुखराम का स्वागत किया। यह घटनाक्रम मौजूदा दौर का है। हम आपको फ्लैशबैक में ले जाते हैं। बताते हैं कि वीरभद्र सिंह और सुखराम में आखिर क्या वजह रही सियासी दुश्मनी की।

मंडी सदर में सुखराम का रहा एक छत्र राज

पंडित सुखराम कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शूमार रहे हैं। मंडी (Mandi) सदर में उनका एक छत्र राज चलता है। मंडी सदर से वह 13 बार विधायक रहे हैं। अब उनका बेटा अनिल शर्मा विधायक है। सुखराम ने विधानसभा चुनाव में कभी हार का सामना नहीं किया। हालांकि पांच लोकसभा चुनाव में वह दो चुनाव जरूर हारें हैं। 1998 में हिमाचल की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट माना जा सकता है। वर्ष 1998 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते सुखराम को कांग्रेस (Congress) से अलविदा कहना पड़ा था। कांग्रेस को अलविदा कहकर उन्होंने अपनी पार्टी बनाई।

 

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पंडित सुखराम एक सच्चे कांग्रेसी थे इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी के नाम के साथ कांग्रेस का नाम जोड़ा। हिमाचल विकास कांग्रेस के नाम से पार्टी बनाई। आगे बताने से पहले हम आपको इस से रूबरू करवाना चाहते हैं। 1993 में वीरभद्र सिंह की सरकार थी और 1998 में वीरभद्र सिंह की मिशन रिपीट की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन, सुखराम की बगावत ने कांग्रेसी खेमे को चिंता में डाल दिया। समय आ गया विधानसभा चुनाव ( Vidhansabha Election) का। सभी पार्टियों ने पूरी ताकत झौंक दी।

बीजेपी ( BJP) आश्वस्त थी कि कांग्रेस में बगावत के बाद उनकी सरकार बनना तय है। वहीं, कांग्रेस भी मिशन रिपीट के लिए पूरी तरह से आश्वस्त थी। चुनाव हुए रिजल्ट निकला। पर परिणाम कुछ और ही रहे। पहली बार चुनावी समर में कूदी सुखराम की पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की। मंडी सदर से सुखराम, लाहुल स्पीति से रामलाल मार्कंडेय, बल्ह से प्रकाश चौधरी, करसोग से मनसा राम और धर्मपुर से महिंद्र सिंह ठाकुर ने शानदार जीत दर्ज की। वहीं, चौपाल, कसौली, गोपालपुर और द्रंग में हिमाचल विकास कांग्रेस के प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। अब बारी आई सरकार बनाने की। पर सरकार कैसे बनती। बीजेपी के खाते में 31 और कांग्रेस के खाते में 31 सीटें आईं। एक आजाद उम्मीदवार ज्वालामुखी से रमेश ध्वाला ने जीत दर्ज की। ऐसे में बिना सुखराम समर्थन से किसी भी पार्टी की सरकार बनना मुश्किल था।

 

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अब सुखराम कांग्रेस को तो समर्थन देते नहीं। उन्होंने बीजेपी को समर्थन दे दिया और प्रेम कुमार धूमल पहली बार हिमाचल के सीएम बने। कांग्रेस का मिशन रिपीट धरा का धरा रह गया। बात करें लोकसभा चुनाव की तो हिमाचल विकास कांग्रेस ने शिमला से धनी राम शांडिल को खड़ा किया। धनीराम शांडित ने जीत दर्ज की। काफी हद तक लोकसभा चुनाव में हिमाचल विकास कांग्रेस ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। बीजेपी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की। अगर बीजेपी के वोट प्रतिशतता की बात करें तो 46. 27 फीसदी वोट बीजेपी को पड़े। कांग्रेस को 39.52 और हिवकां को 12.32 फीसदी वोट पड़े। बाद में हिमाचल विकास कांग्रेस का आस्तित्व खत्म हो गया। कुछ नेता बीजेपी में चले गए तो कुछ कांग्रेस में। 2003 के विधानसभा चुनाव में भी सुखराम की पार्टी ने चुनाव लड़ा। पर मंडी सदर से ही वह जीत पाए।

2007 में फिर कांग्रेस के साथ हो लिए थे सुखराम

इसके बाद 2007 में सुखराम परिवार की एक बार फिर कांग्रेस में वापसी हुई और सुखराम के बेटे अनिल शर्मा को कांग्रेस ने टिकट दिया। वह चुनाव जीते। 2012 में भी अनिल शर्मा ने कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ जीत हासिल की और वीरभद्र सरकार में मंत्री बने। 2017 की यानि पिछला चुनाव तो सबको याद ही होगा। फिर भी हम आपको बताते हैं कि सियासत ने कैसे करवट बदली। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले भी कांग्रेस मिशन रिपीट (Congress Mission Repeat) का जोर-शोर से हल्ला डाल रही थी। वीरभद्र सिंह सातवीं बार सीएम बनने की हुंकार भर रहे थे। इसी वक्त सुखराम के परिवार ने फिर पलटी मारी। विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ज्वाइन कर ली।

 

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अनिल शर्मा इस बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। वर्तमान जयराम सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। इसके अब पंडित सुखराम का जनाधार माने या फिर कुछ और। विधानसभा चुनाव में मंडी जिला से कांग्रेस का सुपड़ा ही साफ हो गया। कांग्रेस एक भी सीट जीत नहीं पाई। बीजेपी ने 9 सीटें जीतीं और एक पर आजाद प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। यह आजाद प्रत्याशी भी आजकल बीजेपी के अंग संग हैं और बीजेपी की पार्टियों में नजर आते हैं। अब लोकसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही पंडित सुखराम ने अपने पोते आश्रय शर्मा को चुनावी समर में कूदवाने के लिए कांग्रेस का दामन थामा। उनका कांग्रेस में जाना अब क्या गुल खिलाता है यह देखना होगा।

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