सोने चांदी व मूर्तियों की पूजा के साथ मलाणा का फागली उत्सव संपन्न

मलाणा में हुई मुगल शासक अकबर की पूजा

सोने चांदी व मूर्तियों की पूजा के साथ मलाणा का फागली उत्सव संपन्न

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कुल्लू। विश्व भर में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मलाणा गांव का पांच दिवसीय फागली उत्सव संपन्न हो गया। मंगलवार को मुगल शासक अकबर की विधि विधान से पूजा की गई। वहीं, देवता जमदग्नि के मंदिर से भी प्राचीन सोने व चांदी के घोड़ों सहित अन्य मूर्तियों को बाहर निकाला गया और देवता के कारकुनों द्वारा उनकी पूजा की गई।

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देवता के सम्मान में पूरे ग्रामीणों ने सारा दिन उपवास किया और शाम को दोबारा पूजा अर्चना के बाद फागली उत्सव मनाया। विश्व के प्राचीनतम लोकतंत्र वाले इस गांव में फागली उत्सव मनाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक पहलू छिपा हुआ है। देवता के कारदार ब्रेसतू राम और पुजारी सूरजणू राम ने बताया कि पुराने समय मे मलाणा गांव में भीक्षा मांगकर घूमते-घूमते दिल्ली से यहां पहुंचे दो साधुओं को सम्राट अकबर ने पकड़ लिया था। सम्राट के सैनिकों ने उनकी झोली में पड़ी तमाम दक्षिणा ले ली थी। इसके बाद जम्दग्नि ऋषि ने स्वप्न में अकबर को ये वस्तुएं लौटाने को कहा। जिस पर अकबर ने फिर सैनिकों के हाथ यहां अपनी ही सोने की मूर्ति बनाकर बतौर दक्षिणा वापस भेजी। इस मूर्ति की तब से यहां पूजा होती है। वहीं, इस फागली उत्सव में अठारह करडू अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं। ब्रेसतू राम और पुजारी सुरजणू का कहना है कि फागली उत्सव में जम्दग्नि ऋषि के बारह गांवों के लोग देवता की चाकरी के लिए पांच दिन तक मौजूद रहते हैं। उन्होंने कहा कि अकबर के द्वारा भेंट की सोने व चांदी की मूर्ति की पूजा अर्चना के लिए हलाल का बकरे काटा जाता है जिसके बाद पूरे गांव के लोग व देवलू इस मास को प्रसाद के तौर ग्रहण करते है।

खराहल घाटी के माहुटी नाग ने दिए ओलावृष्टि के संकेत

वहीं, खराहल घाटी के अधिष्ठाता देवता माहुटी नाग के सम्मान में मंगलवार को फागली का आयोजन हुआ। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। आकर्षण का केंद्र देवता माहुटी नाग द्वारा बर्फ के ढेले का रहता है। इसमें ओलावृष्टि की भविष्यवाणी भी हुई। जैसे ही देवता के कारकूनों ने बर्फ के ढेले को आसमान की ओर उछाला तो उसने नदी की दिशा की तरफ गिरा ओर संकेत दिया। ऐसे में देव कारकून मान रहे हैं कि इस बार बर्फवारी और बारिश होगी।

गत वर्ष भी ओलों के कारण खराहल घाटी के चताणी, रोगी, कोट व लारी कोट में बागवानों को करोड़ों की चपत लग चुकी है। इस बार भी इस देव कारज पर लोगों की निगाहें टिकी हुई थी। साथ ही इस फागली में देव कारकूनों की ओर से तीर हारियानों की ओर फेंके जाते हैं। इसमें जो भी श्रद्धालु तीर को पकड़ता है तो उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है। इन्हें पकड़ने के लिए भी युवाओं में खासा जोश रहता है। फागली में हिस्सा लेने के लिए खराहल घाटी के साथ-साथ मणिकर्ण घाटी के श्रद्धालु भी हिस्सा लेते हैं।

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