मंडी शिवरात्रि महोत्सव : शैव, वैष्णव और लोक देवता का अनूठा संगम

शिवरात्रि पर ग्राम देवताओं के साथ राजा से मिलने आती थी प्रजा

मंडी शिवरात्रि महोत्सव : शैव, वैष्णव और लोक देवता का अनूठा संगम

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वी कुमार/मंडी। जिला मुख्यालय में शिवरात्रि के अगले दिन से मनाया जाने वाला 7 दिवसीय शिवरात्रि महोत्सव (Shivratri mahotsav) आज जिला या प्रदेश स्तर पर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर (International level) पर अपनी पहचान बना चुका है। इसकी सही शुरुआत की तो किसी को जानकारी नहीं, लेकिन यह सच है कि शिवरात्रि महोत्सव का मंडी (Mandi) रियासत के राज परिवार के साथ गहरा नाता है। जब तक मंडी शहर के राजा माधव राय की पालकी नहीं निकलती तब तक शिवरात्रि महोत्सव की शोभायात्रा नहीं चलती।

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राजा माधव राय भगवान विष्णु या कहें कि भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का ही रूप हैं। 17वीं सदी के दौरान मंडी रियासत के राजा सूरज सेन के सभी 18 पुत्रों की मौत हो गई और उन्होंने अपना राजपाठ भगवान श्रीकृष्ण के रूप यानी राज माधव राय के नाम कर दिया और खुद सेवक बन गए। यही कारण है कि जब भी इस महोत्सव की शुरुआत होती है तो सीएम सबसे पहले राज माधव राय की पूजा करते हैं और उपरांत इनकी पालकी को शोभायात्रा में सबसे आगे चलाया जाता है।

 

शिवरात्रि महोत्सव को लेकर एक मान्यता यह भी है कि यह एक ऐसा महोत्सव है जिसमें शैव, वैष्णव और लोक देवता का संगम होता है। शैव भगवान शिव (Lord Shiva) को कहा गया है, वैष्णव भगवान श्री कृष्ण को और लोक देवता देव कमरूनाग को। इन तीनों की अनुमति के बाद ही मंडी का शिवरात्रि महोत्सव शुरू होता है। इतिहासकार बताते हैं कि राजाओं के दौर में वर्ष में एक बार यानी शिवरात्रि के दौरान मंडी रियासत के सभी ग्रामीण अपने ग्राम देवताओं के साथ राजा से मिलने आते थे। इस दौरान वर्ष भर का लेखा-जोखा भी होता था और शिवरात्रि का उत्सव भी मनाया जाता था।

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धीरे-धीरे इस महोत्सव का स्वरूप बदलता गया। राजाओं के राज समाप्त हुए और आज इस महोत्सव का विकसित रूप मंडी के ऐतिहासिक पड्डल मैदान (Paddal maidan) में देखने को मिलता है। अब इस महोत्सव की सारी बागडोर जिला प्रशासन के पास आ गई है। जिले के उपायुक्त इसके चेयरमैन होते हैं और उन्हीं की देखरेख में यह सारा महोत्सव आयोजित होता है। आज भी इस महोत्सव में मंडी रियासत के करीब 215 देवी देवताओं को जिला प्रशासन निमंत्रण पत्र भेजता है। हालांकि कुछ पंजीकृत देवी-देवताओं महोत्सव में नहीं आते, जबकि बिना पंजीकरण वाले देवी-देवता भी इसमें शिरकत करते हैं। देव समागम का यह अद्भुत नजारा देखने के लिए देश-विदेश के लोग यहां पहुंचते हैं और देव समागम ही इसका मुख्य आकर्षण भी है।

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