आदेशों की अनुपालना करने में ढील पर हाईकोर्ट तल्ख, सीएस को दिए यह आदेश

सरकारी विभागों के आदेशों की अनुपालना करने में ढील बरतने को घटियापूर्ण करार दिया

आदेशों की अनुपालना करने में ढील पर हाईकोर्ट तल्ख, सीएस को दिए यह आदेश

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शिमला। हाईकोर्ट ने सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा कोर्ट के आदेशों की अनुपालना करने में ढील बरतने को घटियापूर्ण करार दिया। राज्य सरकार की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश जारी किए कि संबंधित विभागों को इस बाबत जरूरी निदेश जारी करें कि न्यायालय द्वारा पारित आदेशों की अनुपालना समय पर हो, ताकि वादियों को दोबारा कोर्ट के आदेशों की अनुपालना करवाने हेतु बार-बार कोर्ट का दरवाजा न खटखटाना पड़े।


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प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायालय के आदेशों की अनुपालना न करने पर पीडब्ल्यूडी के प्रधान सचिव जगदीश चंद्र को न्यायालय के समक्ष तलब करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने सचिव पीडब्ल्यूडी को आदेश दिए कि वह 2 सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय की अनुपालना करें अन्यथा उन्हें व्यक्तिगत तौर पर हाईकोर्ट के समक्ष अवमानना के चार्ज के लिए पेश होना होगा।


न्यायालय के आदेशों की प्रतिलिपि प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने के आदेश जारी किए हैं तथा उन्हें यह निर्देश जारी किए हैं कि वह सभी संबंधित विभागों को इस बाबत निर्देश जारी करें कि वादियों को अपने मामले में पारित निर्णय की अनुपालना करवाने के लिए हाईकोर्ट के समक्ष बार-बार न जाना पड़े। न्यायालय ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला राज्य सरकार के ऊपर बड़ी कॉस्ट डालने का बनता है। मगर न्यायालय ने राज्य सरकार को इस बार छूट देते हुए केवल भविष्य के लिए सतर्क रहने की चेतावनी दी है। याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार प्रार्थी ने तत्कालीन प्रशासनिक प्राधिकरण के समक्ष वर्ष 2008 से पहले मामला दायर किया था।

पहली बार ट्रिब्यूनल भंग होने के बाद मामला हाईकोर्ट के लिए स्थानन्तरित हो गया। हाईकोर्ट ने प्रार्थी की याचिका को मंजूर करते हुए आदेश जारी किए थे कि प्रार्थी को लिपिक पद का वेतन 1 दिसंबर 1997 से 28 फरवरी 2004 तक अदा किया जाए। इसका भुगतान 31 जुलाई 2012 तक किया जाए। अन्यथा प्रार्थी को 9 फीसदी ब्याज सहित देय वेतन का भुगतान करना होगा। एकल पीठ द्वारा पारित इस निर्णय को हालांकि राज्य सरकार ने अपील के माध्यम से खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। लेकिन खंडपीठ ने एकल पीठ के द्वारा पारित फैसले को सही करार दिया। राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट द्वारा पारित फैसले को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई मगर 13 मई 2015 को राज्य सरकार की याचिका खारिज हो गई। राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद भी हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय की अनुपालना करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। प्रार्थी को मजबूरन अवमानना याचिका के माध्यम से पुनः उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। मामले पर सुनवाई 17 अक्टूबर के लिए निर्धारित की गई है।

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