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पहलः Himachal में उगेगा Russian सीबकथोर्न, 27 करोड़ होंगे खर्च

पहलः Himachal में उगेगा Russian सीबकथोर्न, 27 करोड़ होंगे खर्च

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Russian Sea Buck thorn : कुल्लू। रूस का सीबकथोर्न जल्द ही हिमाचल प्रदेश में उगने जा रहा है। इसके लिए 27 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की जाएगी। कम कांटे, बड़ा फल और उम्दा पैदावार इस सीबकथोर्न की एक बड़ी खासियत है। इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग भी काफी अधिक है। ऐसे में रशियन सीबकथोर्न प्रदेश के किसानों की आर्थिकी को मजबूत करेगा। छरमा के फल 70 रुपये प्रति किलो और पत्तों का दाम 350 रुपये प्रति किलो है। छरमा मांग को देखते हुए हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती को और भी अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है। आमतौर पर सीबकथोर्न की पैदावार बर्फ वाले क्षेत्रों में अधिक होती है।

भारत में सीबकथोर्न की मांग विभिन्न कंपनियां कर रही हैं। उन्हें एक हजार टन फल और 3 हजार टन पत्तों की आवश्यकता है। लेकिन डिमांड के हिसाब से इसका कम उत्पादन हो रहा है। रशियन सीबकथोर्न इस मांग को पूरा करने जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में 500 हेक्टेयर भूमि पर रशियन छरमे के पौधे लगाए जाएंगे। इसमें अधिकतर क्षेत्र लाहौल स्पीति का निर्धारित किया गया है। कुकुमसेरी में 10 वैरायिटी के 4 हजार पौधों की खेती की जा चुकी है, उसके बाद किसानों में ये पौधे बांटे जाएंगे। लाहौल-स्पीति में इस छरमे के पौधे को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि यह पर्यावरण अंसतुलन की दिशा में भी कारगर साबित होने जा रहा है।


  • कम कांटे, बड़ा फल और पैदावार के मामले में है अव्वल
  • मिनिस्ट्री ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी का है यह महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट

लाहौल स्पीति में ग्लेश्यिरों के पिघटने का क्रम अधिक हो गया है। मिट्टी कटान रोकने, भूमि को उपजाउ बनाने में भी इसके पौधे सहायक हैं। लाहौल स्पीति में टॉप किस्म का रशियन सीबकथोर्न तैयार हो रहा है। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में 30 वैज्ञानिक 12 विभिन्न विभागों में सीबकथोर्न पर शोध कार्य में जुटे हुए हैं।

लाहौल स्पीति के छरमा के बीजों में में अन्य सीबकथोर्न के मुकाबले ओमेगा फैटी एसिट की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसमें आंवले से भी अधिक विटामिन सी है। ह्रदय रोग, डायबिटीज, जूस, घाव को भरने, कैंसर, गैस्टिक के लिए यह रामवाण है। बीयर में कडवाहट के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कॉस्मेटिक और चाय-जूस में इसका अधिक प्रयोग हो रहा है। इसकी पतियां प्रोटीन से भरपूर है।

  • प्रदेश के डेढ़ लाख किसानों को किया जा रहा है तैयार
  • लाहौल-स्पीति के 500 हेक्टेयर में उगेगा नई तकनीक का छरमा
  • ह्रदय रोग, डायबिटीज, जूस, घाव भरने, कैंसर, गैस्टिक के लिए रामवाण

पशुओं के लिए भी इसकी फीड तैयार हो रही है। कुल्लू में लाहौल के किसानों को इसकी जानकारी दी गई है। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के एनवायरमेंट साइंस के प्रोफेसर डॉक्टर विरेंद्र सिंह का कहना है कि वे छरमा पर पिछले 25 सालों से काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब रशियन छरमा को उगाया जा रहा है। 27 करोड़ की राशि इस योजना पर खर्च की जा रही है। कम कांटा, बड़ा फल और अधिक उत्पादन इसकी खासियत है। अब मांग के हिसाब से विभिन्न कंपनियों को छरमा के फल और पतियां मिल सकेगी। साथ ही किसानों की आर्थिकी भी इससे सुधर जाएगी। उनका कहना है कि यदि मलाणा में भी भांग की खेती को छोड़कर रशियन तकनीक को अपनाया जाए तो काफी बेहतर होगा। इससे मलाणा के लोगों का सीबकथोर्न की ओर रुझान होगा। वहां हमने इसके पौधे भी देखे हैं।

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