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कुछ इस तरह होती है देवी-देवताओं की होली

कुछ इस तरह होती है देवी-देवताओं की होली

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रंगों से सराबोर होली को खेलने में भला देवतागण भला पीछे क्यों रहें? लोकगीतों में राधा-कृष्ण की होली के रंग ही कुछ और है। ब्रज की होली का तो रंग ही निराला है।
आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर, केसर रंग में बोरी रे रसिया
ब्रज में होली की ऐसी धूम मची कि सब रंग में सराबोर हो गए। जिसका जैसा वश चला उसने वैसी ही होली खेली। श्रीकृष्ण ने भी केसर रंग घोला है और झोली में अबीर भरा है। उड़ते गुलाल से लाल बादल-सा छा गया है। रंग से भरी यमुना बह रही है। ब्रज की गलियों में राधिका होली खेल रही है, रंग से भरे ग्वाल-बाल लाल हो गए हैं।
अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी। केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। देवतागण आकाश से फूल बरसा रहे हैं।
खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
होली के दूसरे दृश्य में, रघुवर और जनक दुलारी सीता अवधपुरी में होली खेल रहे हैं। भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण और हनुमान की अलग-अलग टोली बन गई है। पखावज का अपूर्व राग बज रहा है, प्रेम उमड़ रहा है और सभी गीत गा रहे हैं। थाली में अगर, चंदन और केसरिया रंग भर रहे हैं। सभी अबीर, गुलाल, कुमकुम रख रहे हैं। माथे पर पगड़ी रंग गई है और गलियों में केसर से कीचड़ बन गया है।
खेलत अवधपुरी में फाग, रघुवर जनक लली
भरत, शत्रुघ्न, लखन, पवनसुत, जूथ-जूथ लिए भाग।
बजत अनहद ताल पखावज, उमंगी उमगि अनुराग
गावत गीत भली।
भरि-भरि थार, अगरवा, केसर, चंदन, केसरिया भरि थार
अबरख, अबीर, गुलाल, कुमकुमा, सीस रंगा लिए पाग।
केसर कीच गली।
जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें? हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला, चमकती हुई आँखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं।

देखिए इस अद्भुत दृश्य की झांकी :-

सदासिव खेलत होरी
जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।
लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।
शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। ऐसा लग रहा है मानो कैलाश पर्वत के ऊपर वटवृक्ष की छाया है। दिशाओं की पीले पर्दे खिंचे हुए हैं जिसकी छवि इंद्रासन जैसी दिखाई देती है। आक, धतूरा, संखिया आदि खूब पिया जा रहा है और सबने एक दूसरे को रंग लगाने की बजाय स्वयं को ही रंग लगा कर अद्भुत रूप बना लिया है, जिसे देखकर स्वयं पार्वती जी भी हंस रही हैं।


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