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कई रोगों को दूर करती है शीतला माता

कई रोगों को दूर करती है शीतला माता

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लोक माता के तौर पर पूजी जाने वाली शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही इनका महत्व रहा है और इनके आगमन से लोग भयभीत भी रहते हैं क्योंकि ये बीमारियों की ही देवी मानी जाती हैं। इनकी कृपा पाने के लिए हर ग्राम में इनके थान बने होते हैं जहां इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इनका वाहन गदर्भ है। ये हाथों में कलश, सूप, झाड़ू तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। ये चेचक तथा कई रोगों की देवी हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गदर्भ पर ही आसीन दिखाया गया है। शीतला माता के संग , ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण- त्वचा-रोग के देवता एवं रक्तवती – रक्त संक्रमण की देवी-देवता होते हैं। इनके कलश में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है।

Shitla mata


मां शीतला के कोप की कथा इस प्रकार है। कहते हैं कि एक बार किसी गांव में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे तो मां को गांववासियों ने गर्म भोजन प्रसादस्वरूप चढ़ा दिया। शीतला की प्रतिमूर्ति मां भवानी का गर्म भोजन से मुंह जल गया तो वे नाराज हो गईं और उन्होंने कोपदृष्टि से संपूर्ण गांव में आग लगा दी। बस केवल एक बुढ़िया का घर सुरक्षित बचा हुआ था। गांव वालों ने जाकर उस बुढ़िया से घर न जलने के बारे में पूछा तो बुढ़िया ने मां शीतला को गरिष्ठ और गर्म भोजन खिलाने वाली बात कही और कहा कि उन्होंने रात को ही भोजन बनाकर मां को भोग में ठंडा-बासी भोजन खिलाया, जिससे मां ने प्रसन्न होकर बुढ़िया का घर जलने से बचा लिया। बुढ़िया की बात सुनकर गांव वालों ने मां से क्षमा मांगी और रंगपंचमी के बाद आने वाली सप्तमी के दिन उन्हें बासी भोजन खिलाकर मां का बसौड़ा पूजन किया।

स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

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