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Hp Govt demands: भांग के पौधों को उखाड़ना भी मनरेगा का हिस्सा हो

Hp Govt demands: भांग के पौधों को उखाड़ना भी मनरेगा का हिस्सा हो

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मंडी। सीएम वीरभद्र सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि भांग के पौधे हिमाचल प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में प्राकृतिक तौर पर उगते हैं। यह एक गंभीर सामाजिक खतरा बन जाता है।

  • प्रदेश सरकार ने आग्रह किया है भांग के पौधों को उखाड़ना भी मनरेगा की पात्र गतिविधि शामिल किया जाए। ग्रामीण विकास विभाग ने पहले ही 22 अगस्त, 2016 से 5 सितंबर, 2016 तक भांग, अफीम उन्मूलन अभियान शुरू किया था तथा इस अभियान के अंतर्गत 2145,79 हेक्टेयर क्षेत्र से भांग उखाड़ी गई। 

teaमोदी को सौंपे मांग पत्र में उन्होंने कहा है कि प्रदेश में छोटे तथा मझौले किसानों द्वारा चाय की खेती की जाती है, न कि असम एवं पश्चिम बंगाल राज्यों की तरह जहां बड़े किसान इस व्यवसाय से जुड़े हैं। सीएम ने आग्रह किया कि चाय बागानों के पुनर्जीवन को भी मनरेगा गतिविधि में शामिल किया जाए। पीएम मोदी के वेलकम के साथ ही सीएम ने उन्हें 12 बिंदुओं वाला प्रदेश से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

  • हिमाचल प्रदेश को हरित आवरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने तथा पर्वतीय राज्यों में वनों के संरक्षण के लिए बहुमूल्य पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रदेश को प्रति वर्ष कम से कम 1000 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति अनुदान प्रदान करना।

प्रदेश सरकार के इन प्रयासों से समूचे भारत को व्यापक लाभ पहुंचा है, हालांकि इससे प्रदेश के लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है। तत्कालीन योजना आयोग द्वारा बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में अधोसंरचना के सृजन, जीवनयापन तथा मानव विकास पर विशेष रूप से केन्द्रित वन भूमि प्रबंधन से पर्वतीय राज्यों में विकास के लिए गठित एक समिति ने संस्तुति की थी कि पर्वतीय राज्यों को सकल बजटीय सहयोग के दो प्रतिशत के बराबर वार्षिक विशेष अनुदान प्रदान किया जाए। प्रदेश द्वारा क्षतिपूर्ति अनुदान की मांग इसी समिति की सिफारिशों पर आधारित है।

forestमुख्यमंत्री द्वारा केन्द्र सरकार से हिमाचल प्रदेश को 1000 करोड़ रुपये की विशेष क्षतिपूर्ति अनुदान प्रदान करने की मांग की गई। हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित कुल भौगोलिक क्षेत्र के 33 प्रतिशत क्षेत्र में वन क्षेत्र होने की शर्त को पूरा करता है तथा प्रदेश में 66.5 प्रतिशत क्षेत्र को वन परिक्षेत्र वर्गीकृत किया गया है, अतः केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय को प्रदेश के केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में लम्बित जल विद्युत परियोजनाओं के त्वरित स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए, क्योंकि हिमाचल प्रदेश पहले ही भारत सरकार द्वारा निर्धारित मानदण्डों को पूरा करता है।

हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों को सड़क निर्माण, पेयजल तथा जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए वन भूमि के हस्तांतरण की सीमा को मौजूदा एक हेक्टेयर से बढ़ाकर 10 हेक्टेयर करने की शक्ति प्रदान करने का आग्रह। शिमला देश के बहुत कम राज्यों की राजधानियों में हैं, जहां कोई भी हवाई सुविधा नहीं है। शिमला हवाई अड्डे की अधोसंरचनात्मक सुविधाओं का भी स्त्तरोन्यन किया गया है। प्रधानमंत्री से आग्रह किया गया है कि वह केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय तथा अन्य संबंधित संगठनों को शिमला हवाई अड्डा से व्यावसायिक हवाई सुविधाएं बहाल करने के निर्देश जारी करें।

satlujसतलुज जल विद्युत निगम द्वारा अतिरिक्त भूमि को इंजीनियरिंग कालेज कोटला (ज्यूरी) के उपयोग के लिए हिमाचल प्रदेश को हस्तांतरित की जाए। यह भूमि राज्य सरकार द्वारा 1980 के दशक में सतलुज जल विद्युत निगम को कार्यालय एवं आवासीय कॉलोनियों के निर्माण हेतू दी गई थी तथा वर्तमान में यह सरपल्स है। ज्यूरी अथवा कोटला स्थित इस परियोजना की भूमि का कोई भी उपयोग नहीं हो रहा है। यहां तक कि सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड के अधिकारियों ने भी इस सरपल्स भूमि को कोटला में इंजीनियरिंग कॉलेज के निर्माण के लिए प्रदेश सरकार को हस्तांतरित करने की सिफारिश की है। इस अनुपयोगी भूमि जिसमें निर्मित क्षेत्र भी शामिल है, का उपयोग कॉलेज की स्थापना के लिए किया जा सकता है। प्रधानमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करने तथा सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड के अधिकारियों को शीघ्रातिशीघ्र इस भूमि को प्रदेश सरकार को हस्तांतरित करने का आग्रह किया गया। वर्तमान में भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के प्रबंधन में पंजाब तथा हरियाणा दो ही राज्य हैं, क्योंकि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की परियाजनाएं हिमाचल प्रदेश राज्य की प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र में आती है, अतः यह हिमाचल प्रदेश का कानूनी अधिकार है कि उसे प्रबंधन में पूर्णकालीन सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्व दिया जाएए क्योंकि भाखड़ा परियोजना के कारण प्रदेश की 103425 एकड़ उपजाऊ भूमि तथा ब्यास परियाजनाओं डैहर तथा पौंगद्ध के कारण 65563 एकड़ भूमि के जलगमन होने के कारण  हिमाचल प्रदेश को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

भारत सरकार के दिनांक 16-08-1983 के पत्र व्यवहार के दिशानिर्देशानुसार 19 व 20 जनवरी, 1987 को आयोजित बीबीएमबी की 124वीं बैठक में हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी परियोजनाओं में पूर्व प्रभावी तिथि से सहयोगी राज्य का दर्जा दिया गया था, परन्तु मामले को अभी भी मूर्तरूप प्रदान नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 27-9-2011 के अपने फैसले में हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत की हिस्सेदारी को मान्यता दी थी। प्रधानमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करने  तथा यदि आवश्यक हुआ तो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 में संशोधन कर हिमाचल प्रदेश को पूर्ण कालीन सदस्य के रूप में शामिल करने का आग्रह किया गया तथा हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी में सहयोगी राज्य अधिसूचित किया जाए, ताकि प्रदेश को इन परियोजनाओं में न्यायोचित हक मिल सके।

bhakdaभाखड़ा नंगल समझौता 1959 तथा 31-12-1998 के अंतरराजीय समझौते के अनुसार हिमाचल प्रदेश को सतलुज तथा रावी व ब्यास से पानी का कोई आबंटन नहीं किया गया है। सतलुज, ब्यास तथा रावी नदियों से हिमाचल प्रदेश के जल उपयोग अधिकारों को देखते हुए, हिमाचल प्रदेश के लिये भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड, मंत्रालयों विभागों से जलापूर्ति योजनाओं तथा परियोजना से लगते प्रदेश के ग्रामीण  क्षेत्रों की जलापूर्ति के लिये अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की शर्त को समाप्त करने का आग्रह किया गया।

हिमाचल प्रदेश राज्य ने पंजाब तथा हरियाणा राज्यों के विरूद्ध बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन में 3957 करोड़ रुपये के विद्युत एरियर दावों को 5-7-2011 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप प्रस्तुत किया था।

  • भारत सरकार ने यद्यपि अलग से एनएफएल दरों की संस्तुति की थी, जो हिमाचल प्रदेश को मान्य नहीं हैं।

हिमाचल प्रदेश के दावों को केवल राष्ट्रीय उर्वरक लिमिटिड की दरों तक सीमित रखना न केवल घोर अन्याय है, बल्कि सहभागी राज्यों की भावनाओं के विरूद्व भी है क्योंकि एनएफएल की दरों को रियायती दरें माना जाता है तथा रियायती दरें कभी भी समझौते की दरें नहीं हो सकती।  प्रधानमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया।

thermalएफसीएए 1980 के अंतर्गत प्रदेश को सड़कों के निर्माण के लिये वन भूमि के उपयोग के एवज़ में सीए तथा एनपीवी जमा करना होता है, जो अनिवार्य है। गत तीन वर्षों में प्रदेश ने विभिन्न प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाओं की सड़कों के लिये सीए तथा एनपीवी के रूप में लगभग 60 करोड़ रुपये जमा किए हैं। निकट भविष्य में स्थिति और गंभीर होने वाली है, क्योंकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत आने वाली लगभग सभी सड़कें वन क्षेत्र से गुजरती हैं। प्रदेश की कठिन वित्तीय स्थिति को देखते हुए माननीय प्रधानमंत्री से आग्रह किया गया कि प्रदेश में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाओं की एनपीवी केन्द्र सरकार द्वारा वहन की जाए।

प्रधानमंत्री से भारत सरकार द्वारा एआईबीपी तथा एफएमपी के अंतर्गत पूर्व स्वीकृत योजनाओं के लिये धनराशि जारी करने का आग्रह किया गया। अधिकांश ऐसी परियोजनाओं के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा निजी संसाधनों से ही भारी धनराशि व्यय की जा चुकी है तथा इसका भुगतान करना केन्द्रीय मंत्रालयों द्वारा अभी भी शेष है। प्रदेश सरकार ने स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत हिमालयन सर्किट के तहत 100 करोड़ रुपये की परियोजनाएं केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय को वित्त पोषण हेतु सौंपी हैं। मुख्यमंत्री ने हिमालयन सर्किट योजना के अंतर्गत धनराशि जारी करने के लिये भी केन्द्र सरकार से आग्रह किया।

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