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क्या यही मानवाधिकार है …

क्या यही मानवाधिकार है …

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मानवाधिकार का अभिप्राय मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है, जिसके सभी प्राणी हकदार हैं। नागरिक, राजनीतिक अधिकारों के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के सामने समानता, आर्थिक, सामाजिक और संस्कृति के अधिकार आते हैं। भोजन और शिक्षा का अधिकार सभी को है पर इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहेंगे कि तमाम, प्रदेश, राष्ट्रीय, सरकारी और गैर सरकारी मानवाधिकार संगठनों के होते हुए मानवाधिकारों का परिदृश्य, विसंगतियों और विद्रूपताओं से भरा पड़ा है। किसी भी इंसान की जिंदगी, उसकी आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार ही मानवाधिकार है।

भारतीय संविधान न सिर्फ इसकी गारंटी देता है बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है। संविधान के अनुसार गरिमा और अधिकार के मामले में सब स्वतंत्र और बराबर हैं। नस्ल, रंग, लिंग, भाषा-धर्म, सामाजिक उत्पत्ति, संपत्ति और जन्म जैसी बातों पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। मनमाने ढंग से किसी की संपत्ति नहीं छीनी जा सकती, किसी को शारीरिक यातना नहीं दी जा सकती और न ही किसी के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा सकता है। हमारा देश लोकतांत्रिक देश है पर विविधता के नाते यहां परिस्थितियां जटिल हो गई हैं। सबसे पहले सवालों के घेरे में पुलिस विभाग आता है। पुलिस अकसर अमीर और प्रभावशाली अपराधियों को बचाने के लिए निर्दोष लोगों को पकड़ती है और तब तक उन्हें घोर यातनाएं देती हैं जब तक वे वह अपराध कबूल न कर लें जो उन्होंने किया ही नहीं होता।

इस मामले में पुलिस की जवाबदेही का अब भी अभाव है। पाया गया है कि देश के आधे से अधिक कैदी पर्याप्त सबूत के बिना ही हिरासत में हैं। कई वर्षों से जेल में यूं ही सड़ रहे निर्दोष नागरिकों का होना सामान्य बात नहीं है। दूसरी तरफ राजनीति अपना फायदा लेने के लिए जाति और धर्म के नाम पर लोगों को भड़काने का काम करती है। सांप्रदायिक दंगे आजादी के बाद से ही प्रचलन में रहे हैं और इसकी प्रणेता सिर्फ और सिर्फ राजनीति रही है। आज के दौर में मानवाधिकार शब्द ही जैसे मजाक बन कर रह गया है। कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने और संयुक्त राष्ट्र ने भी, भारत प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्ट दी है। मानव तस्करी अब तक बरकरार है और भारत में यह आठ मिलियन अमेरिकी डालर का अवैध व्यापार है। दलित और जनजाति के लोग लगातार भेदभाव, बहिष्कार और सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हो रहे हैं। हाल के सालों में अल्प संख्यक निशाने पर आ गए हैं। कोई न कोई बहाना बनाकर उनकी हत्याएं की जा रही हैं। क्या यही मानवाधिकार है …? क्या हमारे देश के शासक-प्रशासक इसी तरह अपनी जनता की सुरक्षा करेंगे। यह बेहद निंदनीय है और हर हाल में इसे रुकना ही चाहिए।

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