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भ्रष्ट ताकतों से हारे आईएफएस सुशील कापटा

भ्रष्ट ताकतों से हारे आईएफएस सुशील कापटा

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आईपीएच विभाग की ताकतवर लॉबी की आंखों में बने हुए थे किरकिरी
यशपाल शर्मा/ शिमला। प्रदेश की वीरभद्र सिंह सरकार का भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस का वादा मात्र स्लोगन ही साबित हुआ है। सरकारी विभागों यहां तक कि मंत्रालयों में भ्रष्ट ताकतें फलफूल रही हैं और इनके विरुद्ध मजबूती से लड़ने वाले ईमानदार अफसरों को एक-एक कर किनारे किया जा रहा है। अबकी बार निशाने पर आईपीएच विभाग में विशेष सचिव का जिम्मा संभाल रहे आईएफएस अधिकारी सुशील कापटा आए हैं। वे आईपीएच मंत्रालय में सक्रिय ताकतवर भ्रष्ट लॉबी को बिलकुल रास नहीं आ रहे थे। उनके खिलाफ लंबे समय से साजिश रची जा रही थी। जिसमें अंततः आईपीएच मंत्रालय में सक्रिय छुटभैये नेता और सेवानिवृत्त अधिकारी सफल हो गए। कापटा लंबे समय से भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त रुख अपनाए हुए थे। साफ़ व ईमानदार छवि के होने के कारण सुशील के आगे आईपीएच मंत्री के दायें-बाएं घूमने वालों की एक नहीं चल रही थी। सूत्रों के अनुसार उन्हें निपटाने के लिए मंत्री तक को गलत फीडबैक दिया गया। आईपीएच मंत्री के कार्यालय में तैनात सेवानिवृत्त अधिकारी इसमें अहम भूमिका निभाने में सफल रहे।
himachal_pradesh_seal-svgकापटा पहले ऐसे अफसर नहीं हैं, जो इस लॉबी का शिकार हुए हैं। उनसे पहले मुखर, ईमानदार और वरिष्ठ आईएएस विनीत चौधरी को भी ये निपटा चुके हैं। उन्हें भी आईपीएच विभाग में ईमानदारी से काम करने की ही सजा मिली थी। कापटा के जब तबादला आदेश सचिवालय में टाइप हो रहे थे, वे उस समय सीएम वीरभद्र सिंह के साथ आईपीएच विभाग के मुद्दों पर बुलाई गई बैठक में ही शामिल थे। उन्हें इसका तनिक भी आभास नहीं था कि साजिश रचने वाले अपने मंसूबों में सफल हो गए हैं। मीटिंग से निकलने के बाद उनके हाथ में जैसे ही तबादला आदेश आए, उन्हें पूरा खेल समझने में तनिक भी समय नहीं लगा।

बता दें कि कापटा के तबादले के बाद सरकार एक बार फिर बीजेपी के निशाने पर आ सकती है। चूंकि बीजेपी ने आईएएस युनुस, आईपीएस गौरव सिंह के तबादले पर भी सरकार को घेरा था। आईपीएच मंत्रालय व महकमा तो पहले ही बीजेपी के निशाने पर है। आईपीएच मंत्री व उनके अधिकारियों पर सीधे-सीधे बीजेपी विधायक महेंद्र सिंह और महेश्वर सिंह उंगली उठा चुके हैं। उन्होंने विधानसभा में आईपीएच विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला होने के आरोप लगाए थे। अब बातें ये भी उठने लगी हैं कि आईपीएच मंत्री की आंखों में चुनिंदा अधिकारी अपने स्वार्थ के लिए धूल झोंक रहे हैं और मंत्री को अधिकांश निर्णयों की जानकारी ही नहीं होती।

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