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बच्चों की भी बात सुनें आखिर उनके भी तो अधिकार हैं

बच्चों की भी बात सुनें आखिर उनके भी तो अधिकार हैं

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बाल अधिकार के तहत जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण और स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा और मनोरंजन, नाम और राष्ट्रीयता, परिवार और पारिवारिक पर्यावरण, उपेक्षा से सुरक्षा, बदसलूकी, दुर्व्यवहार, बच्चों का गैर-कानूनी व्यापार आदि शामिल है। बाल अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए संगठन, सरकारी विभाग, नागरिक समाज समूह, एनजीओ आदि के द्वारा कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते है।

यूं तो सभी माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर परवरिश देने का दावा करते हैं, पर अनजाने में वे उन अधिकारों का हनन करते ही हैं जो उनके वास्तविक अधिकार हैं। खुशनुमा माहौल और पूर्ण सुरक्षा के मामले में अकसर बच्चों के अधिकारों का हनन होते देखा गया है। उनसे गलती होने पर उन्हें प्रताड़ित करना, उनकी पिटाई करना ज्यादातर अभिभावक सही समझते हैं। कायदे से उन्हें समझाकर आगे से गलती न करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। जरूरी है कि आप उनकी बात भी सुनें।

बीस नवंबर का दिन बच्चों के उन अधिकारों के लिए समर्पित है जिन्हें संविधान ने तो दिए हैं पर ज्यादातर उन्हें जरूरी नहीं समझा जाता। इन अधिकारों के तहत बच्चों को कानूनी सुरक्षा, सही देखभाल, और संरक्षण विशेष मुद्दे हैं। उन्हें जीवन का अधिकार मिलना ही चाहिए उनकी पहचान, भोजन-पोषण, स्वास्थ्य और संपूर्ण विकास मिलना उनका हक है। अक्सर उनकी पारिवारिक कारणों से उपेक्षा होती है उनकी सुरक्षा खतरे में रहती है, उनके साथ बदसलूकी होती है यहां तक कि वे गैर कानूनी व्यापार के भी शिकार हो जाते हैं।

इस दिवस के मनाए जाने का उद्देश्य ही यही है कि बाल अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए। इस दिन कई संगठन, सरकारी विभाग, समाज समूह आदि के द्वारा कितने ही कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वे मानते हैं कि बच्चों को घर की सुरक्षा, अच्छा परिवेश, शिक्षा, भोजन, खेल, मनोरंजन तथा चिकित्सकीय सुविधा मिलनी ही चाहिए। बेहतर परिवहन और भविष्य की योजनाएं तो उनके लिए हों ही, नई तकनीक तक उनकी पहुंच होना बेहद आवश्यक है। बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा और दुर्व्यवहार रोकना अति आवश्यक है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत बच्चे कुछ दिन बाद ही स्कूल छोड़ जाते हैं जबकि प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने से पहले उनकी पढ़ाई छुड़वाना गलत है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा निःशुल्क है साथ ही मिड डे मील, यूनिफार्म तथा पुस्तकें भी दी जाती हैं। समाज को भी इसमें भूमिका निभानी होगी। बच्चों को खेलने के लिए मैदान चाहिए इसलिए खेल के मैदान को किसी अन्य उपयोग में न लाया जाए। लड़का हो या लड़की उस पर काम का बोझ न डाला जाए। वे कारखाने या असुरक्षित स्थानों पर काम न करें। अगर वे विकलांग हों तो उन्हें आयोजनों समारोहों में उपेक्षा का शिकार नहीं होना चाहिए तथा उनकी सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

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