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दशहरा उत्सव सम्पन्न, सुल्तानपुर मंदिर वापस लौटे भगवान रघुनाथ

दशहरा उत्सव सम्पन्न, सुल्तानपुर मंदिर वापस लौटे भगवान रघुनाथ

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कुल्लू। ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में मनाया जाने वाला कुल्लू का अंतराष्ट्रीय दशहरा उत्सव वीरवार को सम्पन्न हो गया। सात दिनों तक मनाया जाना वाला देव महाकुंभ दशहरा लंका दहन की परंपरा के साथ संम्पन्न हुआ। भगवान रघुनाथ सभी परम्पराओं को समाप्त करने के बाद अपने अस्थाई शिविर से सुलतानपुर स्थित मंदिर लौट गए हैं। इस दौरान कैटल मैदान तक भव्य रथ यात्रा निकाली गई।

इसके साथ ही जिले भर के देवी देवता भी अपने अपने देवालय की ओर रवाना हो गए हैं। भगवान रघुनाथ जी के ढालपुर मैदान के बीच सात दिनों तक के लिए मनाए गए अस्थाई शिविर में रघुनाथ जी की रथयात्रा दोबारा शुरू हुई। देवताओं के भारी समूह और अपार श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच रघुनाथ जी के रथ को मैदान के अंतिम छोर तक ले जाया गया। इस अंतिम दिन लंका दहन का प्रतीकात्मक प्राचीन परंपरा का निर्वाहन करने के बाद दशहरा उत्सव विधि पूर्वक संपन्न हो गया है। दशहरा उत्सव के इस अंतिम दिन को लंका दहन के नाम से जाना जाता है। हर साल की तरह इस साल भी 19 अक्तूबर को दशहरा उत्सव की शुरुआत में भगवान रघुनाथ जी के ऐतिहासिक रथ को खींचकर ढालपुर मैदान के बीच तक लाया गया था। जहां रघुनाथ की मूर्ति को एक सप्ताह तक उनके अस्थाई कैंप में रखा गया था।


दशहरे के अंतिम दिन वीरवार को दोबारा रथ में सवार कर श्रद्धालुओं द्वारा मैदान पशु मैदान के अंतिम छोर ले जाया गया। माता हंडिम्बा की मौजूदगी में लंका बेकर में ब्यास नदी किनारे पर स्थिति बाबड़ी के पास राज परिवार के सदस्यों ने प्राचीन परम्परा निर्वहन किया। इसके बाद माता हंडिम्बा के गुर ने विधि विधान के साथ लंका दहन की परंपरा पूरी की। इसके बाद भगवान रघुनाथ की रथयात्रा जय श्री राम के जयकारों के साथ ऐतिहासिक रथ मैदान में पहुंची।

जहां पर दर्जनों देवी देवता भगवान रघुनाथ से इजाजत लेकर अपने देववालय की ओर रवाना हुए। भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर वाद्ययंत्रों के साथ ऐतिहासिक रथ मैदान के अंतिम छोर पर बंजार घाटी के अराध्य देवता श्रृंगा ऋृषि के साथ मिलन के बाद अपने देववालय लौटे। भगवान की शोभायात्रा के साथ अपने स्थाई शिविर को रवाना हुए।

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