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मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक

मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक

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अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हर साल 21 फरवरी को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता तथा बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। गौरतलब है कि मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक है और इसके बिना किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देशप्रेम की भावना जगाती है। मातृभाषा बालक के विकास को शब्द व पहला संप्रेषण देती है। सोचने, समझने और व्यवहार की अनौपचारिक शिक्षा देती है। इसलिए जहां तक हो सके बालक की शिक्षा मातृभाषा में ही होना चाहिए। भारतीय संविधान बना तो उसके निर्माताओं की आकांक्षा थी कि स्वतंत्रता के बाद भारत का शासन अपनी भाषा में चले, ताकि आम जनता भी शासन से जुड़ी रहे और समाज में एक सामंजस्य स्थापित हो, पर ऐसा संभव नहीं हो सका। आज स्थिति यह है कि देश की प्रगति का लाभ शासन जनता तक उसकी भाषा में पहुंचाने में कामयाब नहीं है।


अंतरराष्ट्रीय तौर पर अंग्रेजी के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता पर वैश्विक दौड़ में हिंदी कहीं से भी पीछे नहीं है। यह सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि सामान्य काम से इंटरनेट तक इसका प्रयोग बाखूबी हो रहा है। इसके बावजूद शासकीय कार्यालयों में सभी काम हिंदी में नहीं होते। दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश मातृभाषा की बदौलत ऊंचाइयों को छू रहे हैं। जापान हमारे सामने इसका एक उदाहरण है। वह विश्व बाजार में एक आर्थिक और औद्योगिक महाशक्ति है और इस मुकाम पर वह अपनी मातृभाषा के बल पर पहुंचा है। चीन भी विश्वपटल पर महाशक्ति बनकर उभरा है। उसके विकास के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि उसकी मातृभाषा मंदारिन का इसमें योगदान है।
भूमंडली करण की इस दौड़ में भौगोलिक दूरियां मिटती जा रही हैं। समय और गति महत्वपूर्ण हो गए हैं। बाजारभाषा, व्यापारजगत का मापदंड होता जा रहा है। अतः जरूरी है कि हम अपनी कमियों को समझें और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए योजनाएं बनाएं और वर्तमान परिवेश में संभावनाओं को विकसित करने के लिए प्रयत्नशील रहें। हमारी मातृभाषा हिंदी है जो लगभग पूरे भारत में बोली जाती है। इसे मात्र एक भाषा न समझें। सच यही है कि भाषा के स्तर पर अबतक हम स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं। यह सबसे बड़ी गुलामी है जो हम झेल रहे हैं। जाहिर है अंग्रेज भले ही चले गए पर अंग्रेजियत की गुलामी अब तक बरकरार है। अगर ध्यान दें तो हिंदी में कहना-सुनना वैसा ही है जैसे कोई सांस लेता है। हर किसी के लिए मातृभाषा ऐसी ही होती है। यही नहीं जब हम अपने ही देश की दूसरे हिस्से में बोली जाने वाली भाषा से परिचित होते हैं तो ऐसा लगता है जैसे अपने ही रिश्तेदार से मिल रहे हों। दावे चाहे जितने किए जाएं पर आज भी हम अपनी मातृभाषा में बोलने में हिचकते हैं, जबकि विदेशी भी इसे सीखने में रुचि ले रहे हैं। पहले तो यही तय कर लें कि हमारी मातृभाषा कौन सी है।

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