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महिला को सम्मान और सुरक्षा के लिए सक्षम होना जरूरी

International Women's Day

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जब भी हम महिला दिवस की बात करते हैं, तो हमारे सामने स्त्री की प्रेम, स्नेह, मातृत्व तथा शक्ति से संपन्न मूर्ति ही सामने आती है। हैरत इस बात पर है कि भारतीय स्त्रियों को महिला दिवस मनाते हुए इतने साल हो गए, पर आज तक उनके जेहन में यह बात आ ही नहीं पाई कि आर्थिक, दैहिक, मानसिक और आत्मिक स्वतंत्रता उनके भारतीय नागरिक होने के अधिकार क्षेत्र में आती है या नहीं। घर में बचपन से दी जाने वाली सहनशीलता की शिक्षा के नाम पर वे घरेलू हिंसा को भी अपनी नियति मान बैठी हैं और खामोशी से सहन करती चली जा रही हैं।

विश्व में आधी आबादी महिलाओं की है लेकिन भारतीय समाज में महिला को वह स्थान नहीं प्राप्त है जिसकी वह हकदार है। कुत्सित मानसिकता वाले लोगों के लिए स्त्री आज भी महज एक देह के अलावा कुछ नहीं है। बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं हमेशा से होती आई हैं। इन्हें पूरी तरह तो रोक पाना भी संभव नहीं है। आप किसी की कुत्सित मानसिकता पर लगाम तो नहीं लगा सकते। यह नैतिकता संस्कार से मिलती है और बच्चों को संस्कार देने में अब माता-पिता की रुचि नहीं रही। इधर स्त्री, पुरुषों के हर कार्य क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। सारे ही काम जैसे उसकी जादुई मुट्ठी में आ गए हैं।

इतनी सफलता के बावजूद हमारे देश में महिला अत्याचार की बढ़ती वारदातों ने नारी सुरक्षा पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अब तो पुलिस भी महिलाओं पर लाठीचार्ज करने और उनकी पिटाई करने से नहीं चूकती। तो इसका समाधान क्या है? अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए खुद महिला को सक्षम होना होगा और अपनी भीरुता को छोडऩा होगा क्योंकि जो डरता है उसे ही दुनिया डराती है। जिस दिन से माताएं अपने घर में बेटे और बेटी का फर्क करना छोड़ देंगी उसी दिन से सामाजिक सोच में बदलाव आना शुरू हो जाएगा। हां, यह जरूर है कि यह लंबी प्रक्रिया होगी और इसमें आधी सदी भी लग सकती है। हालांकि इक्कीसवीं सदी की स्त्री ने अपनी पहचान बना ली है और इसके लिए संघर्ष करना भी सीख लिया है, पर दु:खद है कि महिलाओं की प्रगति ही उनके लिए समस्या बन गई है। वे जान गई हैं कि वे कोई भी उपलब्धि हासिल कर लें अंतत: उनकी स्थिति दोयम दर्जे की ही रहेगी।

जो कुछ भी हो रहा है इससे महिला कहा जाने वाला वर्ग हैरान और हतप्रभ ही नजर आया है। वास्तव में स्त्री, समाज से वही स मान पाने की अधिकारिणी है जो पुरुषों को उनकी अनेक गलतियों के बाद भी एक अच्छा आदमी बनने का अवसर प्रदान करता है। सवाल यही है कि क्या महिलाएं अपने देश और घर में सुरक्षित हैं? वे अधिकारों की बात क्या करें, जब सुरक्षा ही उनके लिए विचारणीय मुद्दा बन कर रह गई है।

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