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ये कांगड़ा चाय है जनाब …

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नीलगिरी, दार्जिलिंग और कांगड़ा चाय में कांगड़ा चाय दूसरे नंबर पर है जो स्वाद और सुगंध दोनों ही आधार पर श्रेष्ठ कही जा सकती है। कांगड़ा चाय हिमाचल के प्रमुख उत्पादों में से एक है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसके जैसी अनोखी सुगंध किसी दूसरी चाय में नहीं मिलती। हिमाचल के आर्थिक संसाधनों में कांगड़ा  हरी चाय प्रमुख है। किसी जमाने में चायनाबुश की  यह चाय लंदन और एम्सटर्डम तक मशहूर थी। इस चाय का इतिहास 170 साल पुराना है। कांगड़ा चाय  ने 1886 और 1895 में क्रमशः गोल्ड और सिल्वर मेडल हासिल किया था।  अंग्रेज यहां आए तो उन्होंने पाया कि यहां की जलवायु चाय के लिए एकदम उपयुक्त है। उन्होंने यहां चाय के बाग लगवाने  शुरू किए। उनके बेहतर प्रयासों से यह व्यवसाय चल निकला । काम नया और फायदेमंद था इसलिए स्थानीय लोगों ने भी  इसमें रुचि ली और कांगड़ा हरी चाय का व्यापार लंदन और एम्सटर्डम तक पहुंच गया। जब 1905 का भूकंप आया तो प्रदेश में हुई भारी तबाही को देखकर अंग्रेज डर गए और औने-पौने दामों में चाय के बागान बेच कर चले गए। कहना न होगा कि भूकंप का हादसा कांगड़ा चाय पर भारी पड़ा और लाख प्रयास के बाद भी इसके उत्पादन का ग्राफ गिरता चला गया। पतन की रफ्तार लगातार जारी रही और भरपूर प्रयासों के बाद भी इसे अबतक संभाला नहीं जा सका है।
kangra tea, himachal, latest hindi newsइसके कारण कितने भी हों, पर उन्हें आसानी से विश्लेषित किया जा सकता है। इतनी बेहतर क्वालिटी होने के बावजूद कांगड़ा ग्रीन टी पूरे भारत में नहीं जाती । पहले कुटीर उद्योग के तहत ही काम चलता रहा , फिर बीड़ बैजनाथ और सिद्धबाड़ी में फैक्ट्रियां खुलीं। तब कुल 6 फैक्ट्रियां थीं चार कोऑपरेटिव और दो निजी हाथों में चल रही थीं। कुछ समय बाद ग्रीन टी का मार्केट डाउन होते ही दोनों फैक्ट्रियों ने ब्लैक टी बनाना शुरू कर दिया। एक अंतराल लेकर बीड़, बैजनाथ और सिद्धबाड़ी की फैक्ट्रियां बंद हो गईं  और चाय के उत्पादन भी ढीले पड़ गए। यही इस व्यवसाय के पतन की शुरुआत थी। इधर चाय के उत्पादकों ने पुश्तैनी व्यवसाय से मुंह मोड़ा और उधर चाय की झाड़ियों का पूरा जंगल खड़ा हो गया। कांगड़ा ग्रीन टी के इस गिरते ग्राफ की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया फिर भी इसे पसंद करने वाले खरीदते रहे और इस्तेमाल भी करते रहे।

अप्रैल से अक्तूबर तक होता है तुड़ान

चाय की पत्तियां बागानों से तोड़ कर सीधे फैक्ट्री में आती हैं इनकी तुड़ान का समय अप्रैल से अक्तूबर तक का होता है । फैक्ट्री में आने के बाद इन्हें रोलिंग प्रक्रिया में डाला जाता है ,फिर ऑक्सीडेशन का काम शुरू होता है  इसके बाद ग्रेडिंग और पैकिंग होती है। हिमाचल की इस चाय की पैकिंग अब इतने तरह की हो गई है कि पता ही नहीं चलता कि किस क्वालिटी या ब्रांड की चाय खरीद रहे हैं। सच तो यह है कि हम अपनी चीजों की कीमत ही नहीं जानते । ऐसे में बेहतरीन कांगड़ा ग्रीन टी अगर देसी चाय बनकर रह जाए तो किसका कसूर।
यह कांगड़ा चाय का दुर्भाग्य है कि इस चाय को सही पब्लिसिटी ही नहीं मिली मार्केट के हिसाब से चाय की गुणवत्ता को सुधारा जाए और इसका डिमांस्ट्रेशन विदेशों में किया जाए तो इसे जीवनदान मिल सकता है। पिछले कुछ सालों में चाय उत्पादकों की चाय कारोबार में घटती रुचि चिंतनीय है। टी बोर्ड ऑफ इंडिया के अनुसार प्रदेश में 2311 हेक्टेयर क्षेत्र चाय क्षेत्र के अधीन है  जिसमें 1097 हेक्टेयर पर उत्पादन हो रहा है। पिछले कुछ सालों में उत्पादन 10 लाख किलो से भी कम रहा है। कांगड़ा में ग्रीन और ब्लैक टी दोनों का ही उत्पादन होता है । मई 2015 तक करीब 6 हजार गार्डन थे और उन पर उत्पादन भी हो रहा था पर चिंता का विषय यही है कि  5800 उत्पादकों में से अब सिर्फ 1500 ही सक्रिय हैं । ऐसे में कांगड़ा चाय का भविष्य क्या होगा कहा नहीं जा सकता।

वह अहमियत नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी

चाय उत्पादकों में असम देश का सबसे बड़ा चाय राज्य है । तमिलनाडु का नीलगिरि पहाड़ भी चाय उत्पादन के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। केरल के मुन्नार हिलस्टेशन में चाय के बागान हैं और कांगड़ा अपनी खास किस्म की चाय के जरिए अलग पहचान रखता है पर अब इस चाय का अस्तित्व खतरे में है। यहां का टीबोर्ड बागवानों को सभी सुविधाएं देने को तैयार है पर उसका भी कोई सुखद परिणाम देखने में नहीं आता।  फिलहाल समस्या यह भी है कि  मार्केट में जो प्रतिद्वंद्विता चाहिए उसकी कमी है। जबतक इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता  तबतक इस व्यवसाय में सुधार की आशा नहीं की जा सकती । दार्जिलिंग चाय के बाद दूसरे नंबर पर होने बावजूद इस चाय को वह अहमियत नहीं मिली ,जो मिलनी चाहिए थी। इस उत्कृष्ट चाय का  एक बार उत्पाद जो गिरा तो संभलने में नहीं आया। कांगड़ा टी का विकास तभी हो सकता है  जब प्रशासन,बागवान और उपभोक्ता के बीच सही तार तम्य स्थापित हो । इससे चाय उत्पादक और श्रमिकों के हित जुड़े हुए हैं।  विशेषज्ञों के मुताबिक अक्तूबर से मार्च तक की अवधि शीतनिद्राकी अवधि होती है।इस दौरान आने वाली कोपलें अच्छी होती हैं। प्रतिवर्ष 9 लाख 21 हजार किलोग्राम चाय का उत्पाद होता है। 2017 में  21 हजार किलोग्राम की गिरावट आई  है।
  • जर्मनी, फ्रांस, पाकिस्तान व अफगानिस्तान सहित अन्य देशों को कांगड़ा चाय का निर्यात हो रहा है।
  • ब्लैक टी के लिए कोलकाता, जबकि ग्रीन टी के लिए अमृतसर में क्लस्टर बनाया गया है। यहीं से चाय का निर्यात होता है।
  • 54 फीसदी क्षेत्र में बेहतर देखभाल का कार्य हो रहा है।

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