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झूठ का बवाल: ‘हम देखेंगे’ के हिंदू विरोधी होने के जांच ही नहीं हो रही, पूरा सच जानें

झूठ का बवाल: ‘हम देखेंगे’ के हिंदू विरोधी होने के जांच ही नहीं हो रही, पूरा सच जानें

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नई दिल्ली/कानपुर। पाकिस्तान के मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ (Faiz Ahmed Faiz) की नज्म ‘हम देखेंगे’ (Hum dekhenge) को लेकर इन दिनों बवाल मचा हुआ है। दरअसल कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से इस बात का दावा किया गया था कि नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ जारी प्रदर्शनों में गाए जा रहे इस नज्म के हिंदू विरोधी होने की जांच आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) की एक कमेटी करेगी। जिसके बाद से कई विपक्षी दलों के नेता और विद्वतजनों ने इस मसले के खिलाफ बयान देकर इस तथाकथित पहल को गलत बताया था। अब इस मसले पर आईआईटी कानपुर के डिप्टी डायरेक्टर मणींद्र अग्रवाल का एक बयान सामने आया है। जिसमें उन्होंने इस बात का दावा किया है कि फ़ैज़ की कविता पढ़ने और इसके हिंदू विरोधी होने की जांच की बात सरासर गलत है।

शिकायतों कि जांच के लिए बनी है कमेटी, नज्म के जांच के लिए नहीं
उन्होंने कहा कि 17 दिसंबर को संस्थान में छात्रों के मार्च के बाद कई तरह की शिकायतें प्रशासन के सामने दर्ज कराई गई थीं। उनकी जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि लोगों की ओर से आई शिकायतों में कहा गया कि 17 दिसंबर के मार्च में फैज की जो कविता पढ़ी गई, उसने उनकी भावनाओं को आहत किया है। वहीं कुछ लोगों ने अपनी शिकायत में कहा कि मार्च में व्यवधान डाला गया, जो कि गलत है। ये सारी चीजें सोशल मीडिया पर डाली गईं, जो गलत है। ऐसे में इन सारी शिकायतों को देखने और इनकी जांच के लिए डायरेक्टर की ओर से एक कमिटी बनाई है। प्रशासन ने इन शिकायतों के निस्तारण के लिए एक कमिटी बनाई है। वहीं नज्म के हिंदू विरोधी या नहीं होने के लिए इस तरह की कोई भी कमेटी नहीं बनाई गाई है।


यहां जानें ‘हम देखेंगे’ का पूरा सच
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ़ैज़ द्वारा लिखी गई यह नज्म हिंदुओं के विरोध में नहीं बल्कि पाकिस्तान में 70 के दशक में हुए जुल्मों पर लिखी गई थी। सन 1977 में पाक के तत्कालीन आर्मी चीफ जिया उल हक द्वारा तख्ता पलट करने और 1979 में जुल्फीकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के बाद फैज ने ‘हम देखेंगे’ को कागज पर उतारा था। वहीं फ़ैज़ की मौत के बाद वह नज्म पाकिस्तान में जुल्मी हुकूमत के खिलाफ बगावत और प्रतिरोध का नारा बन गई थी। इस दौरान लाहौर के स्टेडियम में पाकिस्तान की मशहूर गजल गायिका इकबाल बानो ने 50 हजार लोगों की मौजूदगी में ‘हम देखेंगे’ नज्म को गाकर इसे अमर कर दिया था। तब से लेकर आज तक इसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के कई गायक अपनी आवाज दे चुके हैं।

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