कारगिल दिवस विशेष: जन्मदिन पर आने का किया था वादा, टुकड़ों में पहुंचा था ‘कालिया’ का शव

मां-बाप ने आज भी संभाल कर रखा है बेटे का हस्ताक्षर किया हुआ चेक

कारगिल दिवस विशेष: जन्मदिन पर आने का किया था वादा, टुकड़ों में पहुंचा था ‘कालिया’ का शव

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नई दिल्ली। हर साल 26 जुलाई भारत वर्ष में कारगिल  विजय दिवस (Kargil Vijay Divas) के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन भारतीय सेना को दो महीने से भी ज्यादा लंबे चले युद्ध में जीत हासिल हुई थी, लेकिन इस युद्ध में भारत माता के कई लाल शहीद हुए थे। शहीद हुए इन जवानों में 52 जवान हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के भी शामिल थे। इनमें से ही एक हैं हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला स्थित पालमपुर के शहीद सौरभ कालिया (Saurabh Kalia)। सौरभ कालिया बचपन से ही बहुत शरारती हुआ करते थे। जब वह युद्द के लिए आने वाले थे उस दौरान उन्होंने अपने जन्मदिन पर आने का वादा किया था वो तो नहीं आ सके लेकिन उनका पार्थिव शरीर टुकड़ों में उनके घर पहुंचाया गया था।


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कैप्टन सौरभ कालिया के माता-पिता ने अपने बेटे की याद में आज दिन तक उनके हस्ताक्षर वाला एक चेक संभाल कर रखा हुआ है। ड्यूटी पर जाने से पहले ही उन्होंने ब्लेंक चेक पर हस्ताक्षर करके मां-बाप को सौंपा था। उनके पिता ने बताया कि बेटे से उन्होंने 30 मई 1999 को आखिरी बार बात की थी। उस दिन उसके छोटे भाई का जन्मदिन थे इसी दिन बेटे ने वादा किया था कि वह 29 जून को अपने जन्मदिन पर जरूर आएगा। कारगिल युद्ध में कांगड़ा जिले के सबसे अधिक 15 जवान शहीद हुए थे। जबकि, मंडी जिले से 11, हमीरपुर के सात, बिलासपुर के सात, शिमला से चार, ऊना से दो, सोलन और सिरमौर से दो-दो जबकि चंबा और कुल्लू जिले से एक-एक जवान शहीद हुआ था।

सौरभ की मां विजय के मुताबिक़, ‘सौरभ रसोई में आया और हस्ताक्षर किया हुआ लेकिन बिना रकम भरे एक चेक मुझे सौंपा और मुझे उसके बैंक खाते से रुपए निकालने को कहा क्योंकि वह फील्ड में जा रहा था।’ उन्होंने कहा ये मेरे शरारती बेटे की आखिरी निशाने मेरे पास है। उनके कमरे को आज एक संग्रहालय के रूप में रखा गया है। यहां सिर्फ उन्हीं की ही चीजें हैं। बता दें उन्हें शहादत के बाद लेफ्टिनेंट से कैप्टन के रूप में पदोन्नति दी गई। सौरभ ‘4- जाट रेजीमेंट’ से थे। वह पांच सैनिकों के साथ जून 1999 के पहले हफ्ते में कारगिल के कोकसर में एक टोही मिशन पर गए थे। लेकिन यह टीम लापता हो गई और उनकी गुमशुदगी की पहली खबर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अस्कार्दू रेडियो पर आई थी।

सौरभ और उनकी टीम (सिपाही अर्जुन राम, बंवर लाल, भीखाराम, मूला राम और नरेश सिंह) के लोगों के टुकड़ों में भारत को सौंपें गए थे। उनकी आंखें फोड़ दी गई थी और उनके नाक, कान तथा जननांग काट दिए गए थे। सौरभ के भाई अपने भाई की शहादत के समय केवल 20 साल के थे शहीद भाई को मुखाग्नि दी थी। अब वह हिप्र कृषि विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वह कहते हैं कि सौरभ उन्हें मां-पापा की डांट से मुझे बचाया करता था। हम अपने घर के अंदर क्रिकेट खेला करते थे और कई बार उसने मेरे द्वारा खिड़कियों की कांच तोड़े जाने की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली।

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