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कारगिल विजय दिवस : कैप्टन विक्रम बत्रा से खौफ खाते थे पाकिस्तानी, नाम रखा था ‘शेरशाह’

कारगिल विजय दिवस : कैप्टन विक्रम बत्रा से खौफ खाते थे पाकिस्तानी, नाम रखा था ‘शेरशाह’

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जरा याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आए …. देशभक्ति गीत की ये पंक्तियां जब भी कानों में पड़ती हैं तो आंखों के सामने उन शहीदों की तस्वीरें उभर आती हैं जो देश के लिए शहीद हो गए। अपने प्राण न्योछार करने वाले शहीदों का कर्ज तो हम कभी चुका नहीं सकते, लेकिन उनकी शहादत को हमेशा याद रखकर उन्हें श्रद्धांजलि (Tribute) जरूर दी सकती है। कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे हो गए हैं और इस युद्ध में जहां भारतीय जवानों ने पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा दिए थे वहीं हमने कई वीर जवान भी खो दिए थे उनमें से एक थे कैप्टन विक्रम बत्रा।

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07 जुलाई, 1999 को भारत मां का ये सपूत देश पर न्योछावर हुआ था। मरणोपरांत उन्हें भारत के सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) से पाकिस्तानी भी खौफ खाते थे। कारगिल (Kargil) के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा को पाकिस्तान सेना के इंटरसेप्टेड संदेशों में ‘शेरशाह’ कहा जाता था। विक्रम बत्रा का जन्म हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के घुग्गर गांव में 9 सितंबर, 1974 को हुआ था। विक्रम नेताजी सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद से प्रभावित थे।

विक्रम डीएवी कॉलेज में चार साल पढ़े, उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी (Punjab university) में पढ़ाई की। सीडीएस की तैयारी भी यहीं की और एमए अंग्रेजी में दाखिला लिया। विक्रम ने स्नातक के बाद सेना में जाने का पूरा मन बना लिया था और सीडीएस (सम्मिलित रक्षा सेवा) की भी तैयारी शुरू की। विक्रम को ग्रेजुएशन के बाद हांगकांग में भारी वेतन में मर्चेन्ट नेवी में भी नौकरी मिल रही थी लेकिन सेना में जाने के जज्बे वाले विक्रम ने इस नौकरी को ठुकरा दिया। विक्रम को 1997 को जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। 1999 में कारगिल की जंग में विक्रम को भी बुलाया गया। इस दौरान विक्रम के अदम्य साहस के कारण उन्हे प्रमोशन भी मिला और वे कैप्टन बना दिए गए।श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया था। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून, 1999 को इस पोस्ट पर विजय हासिल की। इसके बाद सेना ने प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने की कवायद शुरू की थी। इसका भी जिम्मा कैप्टन विक्रम बत्रा को ही दिया गया था। इस ऑपरेशन में लेफ्टिनेंट अनुज नैय्यर ने विक्रम बत्रा के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों (Pakistani soldiers) को ढेर किया था। मिशन लगभग पूरा हो चुका था जब कैप्टन अपने कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के लिए लपके। लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में लेफ्टीनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गये थे। कैप्टन बत्रा ने बोला- ‘तुम हट जाओ, तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं’ और वे उन्हें पीछे घसीटने लगे। इस दौरान कैप्टन की छाती में गोली लगी और वे “जय माता दी” कहते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले इस वीर जवान को हमारा नमन।

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