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घर में पूजा का कमरा बनाते समय रखें इन बातों का ध्यान

घर में पूजा का कमरा बनाते समय रखें इन बातों का ध्यान

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घरों में पूजा के कमरे का अपना ही महत्त्व है, घर में पूजा का एक ही स्थान होना चाहिए, अलग-अलग पूजा स्थान कदापि नहीं होने चाहिए जहां तक हो सकें हर घर में पूजा के लिए एक अलग सा कमरा होना चाहिए। अगर अलग से पूजा का कमरा बनाना संभव न हो तो उत्तर दिशा, पूर्व दिशा अथवा घर का ईशान कोण के कमरे का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में पूजा के किए व्यवस्थाएं की जा सकती है और जहां एकाग्रचित होकर ईश्वर की पूजा और आराधना की जा सकती है। एक बात का ध्यान रखें की जब भी आप पूजा करने बैठें तो आपका चेहरा पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।


आसन : इष्टदेव की स्थापना बिना आसन के नहीं करना चाहिए। आसन के लिए आम के लकड़ी का समतल तख्ता ज्यादा शुद्ध माना जाता है, जिसकी ऊंचाई कम से कम ढाई फिट होनी चाहिए। इससे आसन में स्थापित मूर्ति या चित्र का चेहरा आपके चेहरे के ऊंचाई के बराबर हो सकें। उसके ऊपर मूर्ति के अनुरूप कपड़ा बिछाना चाहिए। सामान्य तौर पर शिवजी, सरस्वती मां और भुवनेश्वरी मां के लिए सफेद और बाकि सभी देवताओं के लिए लाल रंग के कपडे़ का उपयोग किया जाता है।

आसन व वस्त्र : पूजा में जितना इष्टदेव के लिए वस्त्र व आसन का महत्त्व है उतना ही महत्त्व अपने वस्त्र व आसन का है। पूजा में पहनने के लिए हमेशा सफेद, लाल या पूजा के अनुरूप बिना सिले हुए कपड़े (धोती) का उपयोग करें व बिछाने के लिए सूती, कुशा, ऊनी या मोटे कपड़े का उपयोग करें। बिना आसन के कभी भी बैठकर या जमीन पर खड़े होकर पूजा न करें, जिससे पूजा व्यर्थ जाती है। पूजा के लिए एक अलग ही कपड़ा हो तो बेहतर है जिसका उपयोग सिर्फ पूजा के लिए करना चाहिए।

मूर्ति स्थापना : पूजा के लिए पत्थर, तांबा, पीतल व अष्टधातु की मूर्ति को श्रेष्ट माना गया है कभी भी प्लास्टिक की मूर्ति का उपयोग न करें। पूजा के लिए इष्टदेव की तीन अंगुल से ज्यादा बड़ी मूर्ति को स्थापित न करें। तीन अंगुल से बड़ी मूर्तियों को स्थापित करने के लिए उनकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी होती है। अत: घर में प्राण-प्रतिष्ठा के बिना इतनी बड़ी मूर्ति नहीं रखनी चाहिए और प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति की दो बार पूजा और भोग लगाना अनिवार्य माना गया है। अगर आप चित्र लगाना चाहते है तो कम से कम एक फुट या उससे बड़ा भी चित्र रख सकते है। एक बात का हमेशा ध्यान रखें इष्टदेव की मूर्ति या चित्र हमारे लिए सजावटी सामान न होकर सम्माननीय और पूजनीय होता है इसलिए घर में जगह-जगह देवी-देवताओं के मूर्ति या चित्र नहीं लगाने चाहिए। अलग-अलग स्थानों पर देवी-देवताओं के चित्र आदि लगाने से घर के सदस्य हमेशा बेचैन व दुखी रहते हैं।

कलश स्थापना : कलश को वैसे तो लक्ष्मी का रूप मानते हैं पर इसकी स्थापना एवं पूजा करने से सिर्फ लक्ष्मी की ही नहीं बल्कि आकाश, जल, थल एवं समस्त ब्रम्हांड की भी पूजा हो जाती है, जिससे हमारे विभिन्न प्रकार के दोषों का निवारण अपने आप ही हो जाता है और सौभाग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होने लगती है इसलिए घर में निम्न मंत्र का जप करते हुए कलश की स्थापना करनी चाहिए।

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