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परशुराम जयंती : भगवान परशुराम ने 21 बार किया था धरती को क्षत्रिय विहीन

परशुराम जयंती : भगवान परशुराम ने 21 बार किया था धरती को क्षत्रिय विहीन

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वैशाख मास शुक्ल पक्ष की तृतीया यानी अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान परशुराम (God parshuram) का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है। भगवान परशुराम विष्णु भगवान के छठे अवतार हैं। ऋषि जमदग्नि और रेणुका परशुराम के माता-पिता थे। उनके तीन बड़े भाई थे, जिनके नाम रुक्मवान, सुषेणवसु और विश्वावसु था। परशुराम अष्टचिरंजीवियों में से एक माने गए हैं।


भगवान शिव
के परमभक्त परशुराम न्याय के देवता  हैं, इन्होंने 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन किया था। यही नहीं इनके क्रोध से भगवान गणेश भी नहीं बच पाये थे। परशुराम में अपने फरसे से वार कर भगवान गणेश के एक दांत को तोड़ दिया था जिसके कारण से भगवान गणेश एकदंत कहलाए जाते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन जो कुछ दान किया जाता है वह अक्षय रहता है यानी इस दिन किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता है। सतयुग का प्रारंभ अक्षय तृतीया से ही माना जाता है।


परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैं और ये क्षत्रियों का पृथ्वी से 21 बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति (Vedic culture) का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पीछे धकेल कर नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम की विशेष रूप से पूजा की जाती है।

 

भीष्म को नहीं कर सके थे पराजित

महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah) परशुराम के ही शिष्य थे। भीष्म काशीराज की बेटियों अंबा, अंबिका और अंबालिका को अपने छोटे विचित्रवीर्य भाई से विवाह कराने के लिए हरण कर लिया। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह राजा शाल्व से प्रेम करती है, तब भीष्म ने उसे छोड़ दिया, लेकिन शाल्व ने अंबा को अस्वीकार कर दिया। जब अंबा ने यह बात परशुराम को बताई तो उन्होंने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा। भीष्म ने इस बात के लिए मना कर दिया, क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने की प्रतिज्ञा ली थी। ऐसा न करने पर परशुराम और उनके बीच युद्ध हुआ। अंत में पितरों की बात मानकर परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस तरह युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत।


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