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जानिए क्या है कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीप दान का महत्व

जानिए क्या है कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीप दान का महत्व

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कार्तिक माह की शुरुआत शरद या अश्विन पूर्णिमा से होती है जो कार्तिक पूर्णिमा को खत्म होती है। भीष्म पंचक और विष्णु पंचक का व्रत भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है।ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का मत्स्यावतार भी हुआ था। इस दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्मसरोवर पुष्कर में अवतरण भी हुआ था। इस दिन अगर भरणी-सा कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है।

इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। इस बार 23 नवंबर को कृतिका नक्षत्र दोपहर 16 बजकर 42 मिनट तक रहेगा तत्पश्चात रोहिणी नक्षत्र लग जायेगा। जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है।कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रायः सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाए जाते हैं और गंगाजी को भी दीपदान किया जाता है। इस दिन गुरु नानक देव की जयन्ती भी मनाई जाती है।


कार्तिक पूर्णिमा व्रत, पूजा विधि तथा महत्व

कार्तिक पूर्णिमा को स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। पूजा-अर्चना की समाप्ति के बाद अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए। दान ब्राह्मणों, बहन, भांजे आदि को देना चाहिए। ऐसी मान्यता है की कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।

शाम के समय वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु इस मंत्र का उच्चारण करते हुए चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। एकादशी व तुलसी विवाह से चली आ रही पंचक व्रत कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त होती है।आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से कार्यरत हो जाते हैं।

सफलता का मंत्र :

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम…पूर्णात, पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय…..पूर्णमेवावशिष्यते

दीप दान का है महत्व :

मत्स्य पुराण के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप-दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। इसलिए इस दिन ब्राह्मणों को विधिवत आदर भाव से निमंत्रित करके भोजन कराना चाहिए।

इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुर्नजन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि के वक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवप्रद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से सम्पति बढ़ती है। कार्तिक पूर्णिमा से आरंभ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते।

पंडित दयानंद शास्त्री, उज्जैन मध्य प्रदेश

 

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