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आयोध्या मामला सुनवाई: मूर्ती रख देने से मस्जिद का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता  

आयोध्या मामला सुनवाई: मूर्ती रख देने से मस्जिद का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता  

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नई दिल्ली। आयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले (Ayodhya-Babri Masjid case) में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्षकारों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जिस ढांचे को तोड़ा गया वहां पहले मंदिर बनने के कोई सबूत नहीं थे। सिर्फ मूर्ती रख देने से मंदिर का अस्तित्व (Existence) खत्म नहीं हो जाता। मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वकील राजीव धवन ने कहा हिन्दू निर्मोही अखाड़ा के किए गए दावे पर कोई आपत्ति नहीं है। धवन ने कहा- अगर याचिका (Petition) समय से दाखिल नहीं हुई तो इसका यह मतलब नहीं कि वहां मस्जिद (Mosque) ही नहीं थी। मूर्तियां रख देने से भी मस्जिद का अस्तित्व खत्म नहीं होता। लगातार नमाज़ ना पढ़ने से भी मस्जिद के वजूद पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।


 

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राजीव धवन ने इस मामले में कहा- बीच वाले गुम्बद के नीचे रामलला की मूर्ति रखकर विवाद पैदा किया गया क्योंकि इस बारे में भी एक मनगढ़त कहानी बनाई गई। धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़े ने पूजा का अधिकार मांगा था। वह हमने उनको राम चबूतरा पर दे दिया था। फिर भी पूरी इमारत और अहाते के प्रबंधन का अधिकार हमारे पास ही था। हिन्दू / निर्मोही अखाड़ा वहां पूजा ज़रूर कर रहे थे वे मालिक नहीं थे। कई दशकों तक राम चबूतरे पर ही खस की चिक से घेरकर बनाए गए छोटे से मंदिर में रामलला की पूजा होती रही थी। काले पत्थरों के खंभों के ज़रिए भी हिन्दू इस जगह पर दावा करते हैं। लेकिन मूर्ति वहां रखी गई थी।

धवन ने कहा – ‘हिंदुओ ने तीन बार विवादित इमारत पर कब्जे की कोशिश की थी। 1528 में बाबर के अयोध्या आने और मस्जिद बनाने की बात कही जाती है। गजेटियर में दर्ज है कि जन्मस्थान के पास मस्जिद थी वहां निर्मोही अखाड़ा ने चबूतरा बनाया। 1825 के आसपास वहां सिंहद्वार बनाने की इजाजत पर भी हंगामा हुआ था। फिर अदालत ने अंदर मस्जिद, बाहर पूजा का आदेश दिया था।

 

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