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कुबेर देव : धन को भोगते नहीं उसकी रक्षा करते हैं 

कुबेर देव : धन को भोगते नहीं उसकी रक्षा करते हैं 

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कुबेर देव को कुछ ग्रंथों में यक्ष भी बताया गया है। यक्ष धन के रक्षक ही होते हैं और वे केवल रक्षा ही करते हैं, उसे भोगते नहीं हैं। प्राचीन काल में जो मंदिर बनाए जाते थे, उन मंदिरों के बाहर कुबेर की मूर्तियां धन रक्षक के रूप में स्थापित की जाती थीं। कुबेर का निवास वटवृक्ष पर बताया गया है। ऐसे वृक्ष घर-आंगन में नहीं होते, गांव या नगर के केन्द्र में भी नहीं होते हैं, ऐसे पेड़ अधिकतर गांव-नगर के बाहर रिहायशी इलाकों से दूर या बियाबान में ही होते हैं।
जहां कुबेर हैं, वहां लक्ष्मी हैं,नवनिधियां हैं,सूर्य का तेज है,योग्य सेवक है,इसीलिए तो कुबेर का स्थान ब्रह्मा,विष्णु,महेश के समकक्ष माना गया है। कुबेरदेव की महत्ता ही निराली है। ब्रह्मा और शिव द्वारा विशेष रूप से आशीर्वाद युक्त होने के कारण इनका स्थान शिव के साथ ही है तथा सूर्य के समान तेज है। रोचक यह है कि देवताओं को भी धन के लिए कुबेर की ही प्रार्थना करनी पड़ती है। उत्तर दिशा का स्वामी कुबेर को ही माना गया है। आकस्मिक धन प्राप्ति तथा गुप्त धन प्राप्ति हेतु भी कुबेर की ही साधना का विधान है। कुबेर की साधना करने से शिव साधना तथा शुक्र साधना का फल मिल जाता है।
कुबेर भी शिव समान सरल देव हैं और इस साधना को तो प्रतिदिन पूजा का अंग ही बना लेना चाहिए। कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी कुबेर  सिद्धि दिवस है। इस दिन प्राण प्रतिष्ठित कुबेर यंत्र स्थापित करना चाहिए।  इस साधना में कुबेर यंत्र तथा कमलगट्टा माला आवश्यक है। इसके साथ नारियल, कुमकुम, केसर, मौळी, जल, पंचामृत, पुष्प,प्रसाद,दक्षिणा इत्यादि की व्यवस्था पहले से ही कर लेनी चाहिए। इस दिन स्नान कर,पीले वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें और चौकी पर चावल की ढेरी पर कुबेर यंत्र स्थापित कर ध्यान करें-
मनुजबाह्यविमान वरस्थितं गरुड़रत्ननिभं निधिनायकं।
शिवसखं मुकुटादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुंदिलम्
इसके बाद 108 बार यंत्र पर पुष्प चढाते हुए इस मंत्र का जप करें-
ओम् श्रीं ओम् ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं
वित्तेश्वराय नमः।।
फिर कमलगट्टे की माला से  मंत्र का  सवा लाख जप करने का विधान है, लेकिन साधक 5 माला प्रतिदिन मंत्र जप अवश्य ही करे। जप समाप्त होने पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए साधना में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांग लें। अगले दिन यंत्र को लाल वस्त्र में लपेटकर तिजोरी में रख दें। माला को जल में प्रवाहित कर दें और सवा महीने बाद यंत्र को भी नदी में प्रवाहित कर दें। यह साधना अद्वितीय है। जिस स्थान पर यह साधना संपन्न की जाती है वह स्थान लक्ष्मी का प्रिय स्थान बन जाता है।  जो भी साधक इस साधना को सफल कर लेता है वह सौन्दर्य, सांसारिक सुख, धन, वैभव निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। मंत्र का जप किसी शिव मंदिर में करना उत्तम रहता है। यदि यह उपाय बिल्वपत्र वृक्ष की जड़ों के समीप बैठकर हो सके तो अधिक उत्तम होता है।

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