हींग की खुशबू से महकेगा हिमाचल का शीत मरुस्थल, रसोई का भी बढ़ेगा जायका

हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान देश में पहली बार उत्पादन करेगा गुणवत्तायुक्त हींग : डॉ. संजय कुमार

हींग की खुशबू से महकेगा हिमाचल का शीत मरुस्थल, रसोई का भी बढ़ेगा जायका

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पालमपुर। हिमाचल (Himachal) का शीत मरुस्थल लाहुल-स्पीति (Lahul Spiti) जल्द ही हींग से महकेगा। देश में पहली बार हिमाचल प्रदेश के शीत मरुस्थल लाहुल-स्पीति में हींग उत्पादन की शुरूआत की जा रही है। हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान ने कृषि तकनीक विकसित कर गुणवत्तायुक्त हींग की पौध तैयार की है। नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जैनेटिक के माध्यम से बीज उपलब्ध करवाया गया है, जिससे गुणवत्तायुक्त हींग की पौध तैयार की गई है। इसकी सफलता से न केवल युवाओं को रोजगार मिलेगा अपितु किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।

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यह जानकारी सीएसआईआर हिमालय संस्थान के निदेशक डॉ. संजय कुमार ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में दी। हिमालय जवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान ने लाहौल-स्पीति के रिबलिंग में हींग की बिजाई की है। देश में अभी तक हींग का उत्पादन नहीं होता है, जबकि विश्व में सबसे अधिक खपत हींग की भारत में है। इसके अतिरिक्त संस्थान स्टीविया के अतिरिक्त मोंक फ्रूट से प्राकृतिक मिठास तत्व विकसित करने की दिशा में भी अग्रसर हैं। केसर की खेती का विस्तार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, तामिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे भारत के अन्य राज्यों में भी किया जा रहा है।

शोध की स्थानीय प्रासंगिकता तथा वैश्विक प्रभाव होना आवश्यक : डॉ. संजय कुमार

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर सीएसआईआर हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान में गुरुवार को बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, हमीरपुर के निदेशक डॉ. विनोद यादव ने कहा कि विज्ञान का मूल उद्देश्य मानव की आवश्यकताओं को पूरा करना है। आवश्यकता क्या है इसके लिए वैज्ञानिकों को समुदाय के पास जाना ही होगा, उसी के आधार पर शोध करके इसे पूरा किया जा सकता है।

डॉ. विनोद यादव ने बताया कि राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान हमीरपुर तथा सीएसआईआर-आईएचबीटी मिलकर कार्य करेंगे तथा संस्थान की शोध संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए परस्पर शोध सहयोग किया जाएगा। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस डा. चन्द्रशेखर वैंकटरमन द्वारा 28 फरवरी 1928 को ‘रमन प्रभाव’ की खोज के लिए उन्हें 1930 में भौतिकी के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। डॉ. रमन की इस खोज को स्मरण करने के लिए प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रुप में मनाया जाता है।

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