होला मोहल्ला मेला मैड़ी में श्रद्धालुओं ने जमकर उड़ाया गुलाल

आठवें दिन झंडा चढ़ाने की रस्म अदा की 

होला मोहल्ला मेला मैड़ी में श्रद्धालुओं ने जमकर उड़ाया गुलाल

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ऊना। उत्तर भारत में यूं तो होला मोहल्ला ( Hola mohalla)  पूरे पंजाब में  धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन पंजाब ( Punjab) के साथ लगते राज्यों में भी यह उसी जोश व जूनून के साथ मनाया जाता है। होला मोहल्ला का जोश हिमाचल के ऊना ज़िले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल डेरा बाबा बड़भाग सिंह में भी दिखाई देता है। जहां मेले के मद्देनजर डेरे सहित पूरे इलाके को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। यहां होला मोहल्ला का आयोजन पूरे दस दिनों तक किया जाता है, यहां हर बार की तरह मेले के आठंवे दिन गुरुवार को श्रद्धालुओं का खूब सैलाब उमड़ा। आठवां दिन होली का होता है, इसी दिन हर साल की तरह सबसे पहले झंडा चढ़ाने की रस्म अदा की गई और फिर उसके बाद श्रद्धालुओं ने रंगों गुलाल से जमकर होली ( Holi) खेली।

 


 

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 डेरा बाबा बड़भाग सिंह के इतिहास पर नजर डाली जाए तो वर्ष 1761 में पंजाब के कस्बा करतारपुर में सिख गुरू अर्जुन देव के वंशज बाबा राम सिंह सोढ़ी और उनकी धर्मपत्नी माता राजकौर के घर में बड़भाग सिंह का जन्म हुआ। उन दिनों अफगानों के साथ सिख जत्थेदारों की खूनी भिड़तें होती रहती थी। बाबा बड़भाग सिंह बाल्याकाल से ही आध्यात्म को समर्पित होकर पीड़ित मानवता की सेवा को ही अपना लक्ष्य मानने लगे थे। कहते है कि एक दिन वो घूमते हुए आज के मैड़ी गांव स्थित दर्शनी खड्ड जिसे अब चरण गंगा कहा जाता है, जा पहुंचे और यहां के पवित्र जल में स्नान करने के बाद मैड़ी स्थित एक बेरी के पेड़ के नीचे ध्यानमग्न हो गए। उस समय मैड़ी का यह क्षेत्र बिल्कुल वीरान था और दूर दूर तक कोई आबादी नहीं थी। कहते है कि यह क्षेत्र वीर नाहर सिंह नामक एक पिशाच के प्रभाव में था।

 

नाहर सिंह द्वारा परेशान किए जाने के बाबजूद बाबा बड़भाग सिंह इस स्थान पर घोर तपस्या की तथा एक दिन दोनों का आमना-सामना हो गया तथा बाबा बड़भाग सिंह ने दिव्य शक्ति से नाहरसिंह पर काबू पाकर उसे बेरी के पेड़ के नीचे ही एक पिंजरे में कैद कर लिया। कहते है कि बाबा बड़भाग सिंह ने नाहर सिंह को इस शर्त पर आजाद किया था कि नाहर सिंह अब इसी स्थान पर मानसिक रूप से बीमार और बुरी आत्माओं के शिंकजे में जकड़े लोगों को स्वस्थ करेंगे और साथ ही निःसंतान लोगों को फलने का आशीर्वाद भी देंगे। यह बेरी का पेड़ आज भी इसी स्थान पर मौजूद है तथा हर वर्ष लाखों की तादाद में देश विदेश से श्रद्धालु आकर माथा टेककर आशीर्वाद प्राप्त करते है। ऐसी मान्यता है कि अगर प्रेत आत्माओं से ग्रसित व्यक्ति को इस कुछ देर के लिए इस बेरी के पेड़ के नीचे बिठाया जाए तो वो व्यक्ति प्रेत आत्मायों के चंगुल से आजाद हो जाता है।
होला मोहल्ला मेला हर वर्ष फाल्गुन के विक्रमी महीने में पुर्णिमा के दिन आयोजित किया जाता है। दस दिनों तक मनाए जाने वाला यह मेला देश ही नहीं अपितु विदेश में भी खासा प्रसिद्ध है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल तथा देश के अन्यों हिस्सों से लाखों की तादाद में श्रद्धालु इस मेले में शरीक होने के लिए आते है। श्रद्धालुओं की माने तो यहां पर सच्चे मन से जो भी मुराद मांगी जाए बाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते है।  मेले में देश विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद को देखते हुए पुलिस प्रशासन ( Police administration) द्वारा सुरक्षा चाक चौबंद की गई है ।

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