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जानिए पितृ पक्ष में काले तिल और जौ का महत्व

जानिए पितृ पक्ष में काले तिल और जौ का महत्व

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पितरों को प्रसन्न करने के लिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पितृ पक्ष का पालन किया जाता है। पितरों के खुश और सुखी रहने से परिवार में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती


है। श्राद्ध और तर्पण क्रिया में काले तिल का बड़ा महत्व है। श्राद्ध (Shradh) करने वालों को पितृकर्म में काले तिल का इस्तेमाल करना चाहिए। लाल और सफेद तिल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

पितृ ऋण से मुक्ति के लिए पितृ पक्ष में विधि विधान से श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। श्राद्ध में तिल, चावल और जौ को महत्व दिया जाता है। श्राद्ध का अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों को है।

यह भी पढ़ें :-श्राद्ध के दिनों भूल कर भी न करें ये गलतियां

तिल और कुशा का भी महत्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत

महिलाओं को भी होता है। अपने पितरों को तृप्त करने की क्रिया तथा देवताओं, ऋषियों या पितरों को काले तिल, अक्षत् मिश्रित जल अर्पित करने की प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है।

व्यक्ति की मृत्यु तिथि पर तिल, चावल, जौ आदि के भोजन को पिंड (गोला) स्वरूप में अपने पितरों को अर्पित करने की क्रिया ही पिंडदान कहलाती है। जिनकी तिथि ज्ञात न हो उनका

पिंडदान अमावस्या के दिन किया जाता है। पितरों को तृप्त करने के लिए श्रद्धा पूर्वक जो प्रिय भोजन उनको दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। इसमें तिल, चावल, जौ आदि को अधिक

महत्त्व दिया जाता है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ (Food items) को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। तर्पण और पिंडदान श्राद्ध कर्म के दो भाग हैं।

जानिए क्यों जरूरी है श्राद्ध

ब्रह्मपुराण की मान्यता के मुताबिक, अगर पितर रुष्ट हो जाए तो लोगों को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। घर में लड़ाई-झगड़े बढ़ जाते हैं। जातक के जीवन में,

परिवार, रोजगार के साथ साथ अनेक काम में रुकावट आती है।

कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है। ऐसी मान्यता है कि विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण नहीं करने से, उस व्यक्ति की आत्मा को

पृथ्वी लोक से मुक्ति नहीं मिलती है। वह आत्मा के रूप में संसार में ही रह जाता है।

कहते हैं जौ और तिल इन दो चीजों के बिना किया गया श्राद्ध पितरों को प्राप्त नहीं होता है। शास्त्रों के अनुसार काला तिल भगवान विष्णु का प्रिय है और यह देव अन्न है इसलिए पितरों को

भी तिल प्रिय है इसलिए काले तिल से ही श्राद्धकर्म करने का विधान है। मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाए, तो दुष्ट आत्माएं हवि को ग्रहण कर लेती हैं।

जौ और तिल पितरों को पसंद होने की वजह से पिंड बनाने में इसका जौ, तिल का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। जौ और तिल को अच्छे से धोकर पूजन विधि में इसका इस्तेमाल किया

जाता है। इनके साथ-साथ कुश (घास) का भी प्रयोग किया जाता है। ये सब चीजें पवित्र मानी जाती हैं और बुरी शक्तियों को दूर रखती हैं।

काले तिल, शहद और कुश को तर्पण व श्राद्धकर्म में सबसे जरूरी हैं। माना जाता है कि तिल और कुश दोनों ही भगवान विष्णु के शरीर से निकले हैं और पितरों को भी भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं।

कुश का अग्रभाभ देवताओं का, मध्य मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। वहीं तिल पितरों को प्रिय और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। श्राद्ध एवं तर्पण क्रिया में काले तिल का बड़ा महत्व है। कहते हैं तिल का दान कई सेर सोने के दान के बराबर है। इनके बिना पितरों को जल भी नहीं मिलता।

साथ ही दान करते समय भी हाथ में काला तिल जरूर रखना चाहिए इससे दान का फल पितरों एवं दान कर्ता दोनों को प्राप्त होता है। इसके अलावा शहद, गंगाजल, जौ, दूध और घृत इन सात पदार्थ को श्राद्धकर्म के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

बिना तिल छिड़के श्राद्ध पूजन की शुरूआत नहीं की जाती है। ऐसा करने से पूजन का कोई फायदा तो नहीं होता है, उल्टा दुष्प्रभाव ही पड़ता है।

जानिए तर्पण या श्राद्ध में स्थान का महत्व –

श्राद्ध कर्म में स्थान का विशेष महत्व है। उज्जैन के गया कोठा तीर्थ एवं सिद्धवट तीर्थ के साथ-साथ, प्रयाग, मातृगया, पुष्कर, करूक्षेत्र, गया (बिहार) एवम बद्रीनाथ में श्राद्ध और पिंडदान

करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। जो लोग इन स्थानों पर पिंडदान या श्राद्ध नहीं कर सकते, वो अपने घर के आंगन में जमीन पर कहीं भी तर्पण कर सकते हैं लेकिन किसी और के घर

की जमीन पर तर्पण नहीं करना चाहिए। इस कनागत(पितृपक्ष या महालय) की अवधि में कुत्ते, बिल्ली, और गायों को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचानी चाहिए।
ध्यान रखें, पितृपक्ष के दौरान नए वस्त्र भी नहीं पहनने चाहिए।

पंडित दयानंद शास्त्री, उज्जैन (म.प्र.) (ज्योतिष-वास्तु सलाहगाड़ी) 09669290067, 09039390067


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