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छठ पूजा : चार दिन चलता है पूजन, जानिए व्रत करने से मिलता है क्या लाभ

छठ पूजा : चार दिन चलता है पूजन, जानिए व्रत करने से मिलता है क्या लाभ

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दिवाली, भाई दूज के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से ही देवी छठ माता की पूजा-अर्चना शुरू हो जाती है और सप्तमी की सुबह तक चलती है। छठ संभवत: एकमात्र त्योहार है, जिसमें डूबते सूरज की पूजा की जाती है। मान्यता है कि छठ पर्व शरीर में होने वाले किसी भी प्रकार के चर्म रोग, यहां तक कि कुष्ठ जैसे भयानक चर्म रोग से मुक्ति के लिए भी किया जाता है।पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने भी कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए सूर्य देव की आराधना की थी। छठ पूजा करने वाले व्रतियों की इस पर्व में अगाध श्रद्धा है।

उन्हें इस बात में दृढ़ आस्था रहती है कि भगवान सूर्य से मांगी गई हर मुराद निश्चित पूरी होती है। लोक विश्वास यह भी है कि छठ व्रत-उपवास करने वाले परिवार में कुष्ठ या चर्म रोग नहीं होता है। इस बात की पुष्टि भविष्य पुराण भी करता है। इसकी चर्चा मार्कण्डेय पुराण में भी मिलती है। इस पर्व में व्रती द्वारा जो साधना की जाती है, वह इतनी कठोर होती है कि मुनियों ने इस पर्व को हठयोग की संज्ञा दी है।

इस व्रत को करने वाले व्यक्तियों द्वारा पूरे 36 घंटे तक जल भी ग्रहण नहीं करना, पूरे समय नंगे पांव चलना, रात में भूमि पर शयन करना, गृहस्थ जीवन में एक हठयोग की तरह ही है। इस पर्व में रात्रि में मिट्टी से बने हाथी की भी पूजा करने का प्रावधान है। छठ प्रकृति से प्रेम का प्रतीक है। इस त्योहार का उद्देश्य सूर्य से अपनेपन और निकटता को महसूस करना है। सूर्य को जल अर्पित करने का अर्थ है कि हम संपूर्ण हृदय से आपके (सूर्य के) आभारी हैं और यह भावना प्रेम से उत्पन्न हुई है। इसमें दूध से भी अर्घ्य देते हैं। दूध पवित्रता का प्रतीक है। दूध को पानी के साथ अर्पित किया जाना इस बात को दर्शाता है कि हमारा मन और हृदय दोनों पवित्र बने रहें।

शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय होता है। इसमें व्रती का मन और तन दोनों ही शुद्ध और सात्विक होते हैं। इस दिन व्रती शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं। शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना का विधान होता है। व्रती सारा दिन निराहार रहते हैं और शाम के समय गुड़ वाली खीर का विशेष प्रसाद बनाकर छठ माता और सूर्य देव की पूजा करके खाते हैं। षष्टि तिथि के पूरे दिन निर्जल रहकर शाम के समय अस्त होते सूर्य को नदी या तालाब में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं और अपने मन की कामना सूर्यदेव को कहते हैं। सप्तमी तिथि के दिन भी सुबह के समय उगते सूर्य को भी नदी या तालाब में खड़े होकर जल देते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

छठ पूजा की तिथियां –

 

18 नवंबर 2020, बुधवार- चतुर्थी (नहाय-खाय)

19 नवंबर 2020, गुरुवार- पंचमी (खरना)

20 नवंबर 2020, शुक्रवार- षष्ठी (डूबते सूर्य को अर्घ)

21 नवंबर 2020, शनिवार- सप्तमी (उगते सूर्य को अर्घ)

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