इस बार क्या गुल खिलाता है राजनीति के चाणक्य का कांग्रेस में जाना

18 चुनाव लड़े, 2 बार हुई हार, विधानसभा में एक बार भी नहीं खाई मात

इस बार क्या गुल खिलाता है राजनीति के चाणक्य का कांग्रेस में जाना

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मंडी। लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) से ठीक पहले पूर्व केंद्रीय संचार राज्य मंत्री पंडित सुखराम (Pandit Sukhram) ने एक बार फिर कांग्रेस (Congress) का हाथ थाम लिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले पंडित सुखराम का कांग्रेस में जाना क्या गुल खिलाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह चुनाव पंडित सुखराम की अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। राजनीति के चाणक्य पंडित सुखराम ने विधानसभा चुनाव के वक्त भी अपने बेटे अनिल शर्मा (Anil Sharma) को बीजेपी (BJP) ज्वाइन करवाकर सबको चौका दिया था। इसके परिणाम भी सार्थक निकले। मंडी सदर से न केवल अनिल शर्मा चुनाव जीते बल्कि, मंडी में कांग्रेस का सुपड़ा ही साफ हो गया। 10 में से 9 सीट पर बीजेपी ने जबरदस्त जीत हासिल की। एक सीट पर निर्दलीय चुनाव जीते, जोकि अब बीजेपी के अंग संग हैं। यहां तक की बीजेपी की बैठकों में भी नजर आते हैं।


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मंडी सदर से निर्दलीय लड़ा था पहला चुनाव

पंडित सुखराम की बात करें तो 93 वर्ष की आयु वाले पंडित सुखराम सरकारी कर्मचारी थे। उन्होंने 1953 में नगर पालिका मंडी में बतौर सचिव अपनी सेवाएं दी। इसी दौरान उन्होंने राजनीति में कदम रखा। 1962 में मंडी सदर से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। मंडी में उनका जनाधार देखते हुए1967 में कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया। इस बार भी वह फिर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद पंडित सुखराम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने सदर विधानसभा क्षेत्र से 13 बार चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। विधानसभा चुनाव में पंडित सुखराम ने कभी हार का मुंह नहीं देखा। केंद्र में उनकी जरूरत महसूस होने पर उन्हें लोकसभा का टिकट भी दिया गया। वह लोकसभा का चुनाव भी जीते और केंद्र में विभिन्न मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। 1984 में सुखराम ने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और प्रचंड बहुमत के साथ संसद पहुंचे। 1989 के लोकसभा चुनावों में उन्हें बीजेपी के महेश्वर सिंह से हार का सामना करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनावों में सुखराम ने महेश्वर सिंह को हराकर फिर से संसद में कदम रखा। 1996 में सुखराम फिर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे।

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1998 में बनाई हिमाचल विकास कांग्रेस

1998 में हिमाचल की राजनीति में ऐसा दौर भी आया, जब पंडित सुखराम को कांग्रेस छोड़ अपना रास्ता बनाकर चलना पड़ा। यह दौर पंडित सुखराम के लिए काफी चुनौतियों भरा था। क्योंकि 1998 में ही आय से अधिक संपत्ति मामले में सुखराम के घर सीबीआई की रेड पड़ी। इसके चलते कांग्रेस पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया। उन्होंने किसी भी पार्टी में जाकर खुद की पार्टी बनाई और उसका नाम रखा हिमाचल विकास कांग्रेस। अपनी नई पार्टी के साथ कांग्रेस का नाम जोड़ना इस बात का संकेत देता था कि सुखराम की कांग्रेस में कितनी आस्था थी। खैर उन्होंने पार्टी बनाकर पहली बार हिमाचल में विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ा। काफी हद तक पंडित सुखराम की पार्टी ने हिमाचल में कांग्रेस की नींव हिला कर रख दी। 1998 विधानसभा चुनाव में सुखराम की पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी को समर्थन देकर पहली बार प्रेम कुमार धूमल को सीएम बनाया। लोकसभा चुनाव में मंडी से वह हार गए, लेकिन उनकी पार्टी ने शिमला की सीट पर शानदार जीत दर्ज की। शिमला से कर्नल धनीराम शांडित सांसद चुने।

सुखराम ने 2003 में अपना आखिरी विधानसभा का चुनाव लड़ा

पंडित सुखराम ने 2003 में अपना आखिरी विधानसभा का चुनाव लड़ा और फिर 2007 में सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे अनिल शर्मा को सौंप दी। पंडित सुखराम ने विधानसभा के 13 और लोकसभा के 5 चुनाव लड़े। विधानसभा चुनाव में वह कभी नहीं हारे, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्हें दो बार हार का मुंह देखना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए सुखराम के पोते आश्रय शर्मा ने टिकट के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन बीजेपी ने मौजूदा सांसद को ही टिकट दिया। इससे खफा होकर पंडित सुखराम अब दोबारा से अपने पोते संग कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। अब इनका पोता इनकी मंडी संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए मैदान में उतरने वाला है।

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सीएम बनने की थी चाहत

पंडित सुखराम हिमाचल प्रदेश के सीएम बनना चाहते थे, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। इस बात को लेकर उनका हमेशा सीएम वीरभद्र सिंह के साथ 36 का आंकड़ा रहा। पंडित सुखराम की वरिष्ठता को पार्टी ने हमेशा नजरअंदाज किया और इस बात की टीस उनमें हमेशा रही। यही कारण था कि पंडित सुखराम ने अपना एक अगल दल बना दिया था, लेकिन उसके दम पर भी वह सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंच सके। पंडित सुखराम के दोबारा कांग्रेस में शामिल होने से कई सियासी समीकरण बदले हैं। बात अगर मंडी संसदीय क्षेत्र की करें तो यहां पर अभी भी सुखराम के लाखों चाह्वान मौजूद हैं। सुखराम के मैदान में उतरते ही यह चाह्वान उनके साथ चल सकते हैं। इन्हें संचार क्रांति का मसीहा माना जाता है और जब कभी यह किसी कार्यक्रम में जाते हैं तो लोग इन्हें सुनने और देखने के लिए ऐसे ही उमड़ पड़ते हैं। लेकिन सुखराम का जादू बरकरार है या समाप्त हो चुका है इसका पता प्रचार के दौरान और परिणामों से ही चल पाएगा।

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