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हिमालय में बर्फ पिघलने के कारण बनी सभी Glacier Lakes की Mapping की तैयारी

बाढ़ की घटनाओं को समझने के लिए ग्लेशियर झीलों की हो रही नियमित निगरानी

हिमालय में बर्फ पिघलने के कारण बनी सभी Glacier Lakes की Mapping की तैयारी

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शिमला। हिमाचल सरकार हिमालय में बर्फ पिघलने के कारण बनी सभी ग्लेशियर झीलों (Glacier Lakes) की मैपिंग (Mapping) करने की कार्य योजना बना रही है। इन झीलों में काफी मात्रा में पानी होने के कारण यह भविष्य में नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। वर्ष 2014 में भारी बारिश के साथ चोराबरी ग्लेशियर के आगे बनी छोटी सी झील के फटने के कारण केदारनाथ जैसी त्रासदी हुई थी। इसके चलते ही हिमाचल सरकार (Himachal Govt) ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और अनुसंधान के लिए विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण राज्य परिषद् के तहत जलवायु परिवर्तन के लिए राज्य केंद्र स्थापित किया है। केंद्र द्वारा हिमाचल प्रदेश में विभिन्न बेसिन और सतलुज नदी के निकटवर्ती तिब्बत जलग्रह की स्पेस डाटा के माध्यम से ग्लेशियर के कारण बाढ़ की घटनाओं को समझने के लिए ग्लेशियर झीलों की नियमित निगरानी की जा रही है।


अज्ञात कारणों से बाढ़ की स्थितियां होती रहती है उत्पन्न

 

 

हिमाचल प्रदेश में अज्ञात कारणों से बाढ़ की स्थितियां उत्पन्न होती रहती हैं। सतलुज घाटी में वर्ष 2000 में भारी बाढ़ आई थी, जिससे 800 करोड़ रूपए से अधिक का नुकसान हुआ था। यह घटना बादल फटने या ग्लेशियर झील के फटने से हुआ, विशेषज्ञों को इस बाढ़ के कारण ज्ञात नहीं थे, क्योंकि यह तिब्बितयन हिमालय क्षेत्र से शुरू हुई थी। ऊचांई वाले क्षेत्रों में भू-स्खलन से पारछू जैसी झील बनने से निचले क्षेत्रों में जल बहाव से भारी नुकसान का खतरा पैदा हो गया था। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो गया है कि ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्रों (Watershed areas) की अंतरराष्ट्रीय आयाम के आधार पर निरंतर और लगातार निगरानी की जाए।

यह भी पढ़ें: धार्मिक यात्राओं पर लगे Ban को हटाने से पहले Monsoon से डरी हिमाचल सरकार

पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी सचिव रजनीश के मुताबिक जलवायु परिवर्तन (Climate change) से केंद्र द्वारा 2019 में किए गए शोध के आधार पर वर्ष 2019 में सतलुज बेसिन में 562 झीलों की उपस्थिति दर्ज की गई है, जिनमें से लगभग 81 प्रतिशत (458) झीलें 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल की है, 9 प्रतिशत (53) झीलें 5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्रफल और 9 प्रतिशत (51) झीलें 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल की हैं। चिनाब घाटी जिसमें चंद्रा, भागा और मियार सब बेसिन है, में लगभग 242 झीलें हैं। चंद्रा में 52, भागा में 84 और मियार सब बेसिन में 139 झीलें हैं। ब्यास घाटी जिसमें उपरी ब्यास, जीवा, पार्वती घाटियां सम्मिलत हैं, में 93 झीलें हैं। ऊपरी ब्यास में 12, जीवा में 41 और पार्वती सब बेसिन में 37 झीलें हैं। वर्ष 2018 की तुलना में 2019 में लगभग 43 प्रतिशत वृद्धि के संकेत है।

ऊंचे क्षेत्रों में झील बनने की प्रवृति में आई है तेजी

 

 

हिमाचल प्रदेश में हिमालय क्षेत्र और इसके साथ लगते तिब्बितयन हिमालय क्षेत्र के ऊंचे क्षेत्रों में झील (Lake) बनने की प्रवृति में तेजी आई है। सदस्य सचिव हिमकोस्ट व निदेशक एवं विशेष सचिव राजस्व और आपदा प्रबन्धन डीसी राणा के मुताबिक ऊपरी हिमालय क्षेत्र में झील बनने की घटनाओं पर परम्परागत तरीकों से नजर रखना संभव नहीं है। इसलिए इन क्षेत्रों में जांच के लिए स्पेस तकनीक बहुत ही उपयोगी और सहायक सिद्ध हुई है। हिमकोस्ट का पर्यावरण परिवर्तन केन्द्र झीलों की मैपिंग और निगरानी कर रहा है।

 

इससे हिमाचल व साथ लगते तिब्बितयन हिमालय क्षेत्र (Tibetan Himalayan Region) में ऐसी सभी संवेदनशील झीलों के पूर्व आंकलन में मदद मिली है। 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र और 5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्र की झीलों को नुकसान के दृष्टिगत संवेदनशील क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। इनके फटने की स्थिति के मददेनजर राज्य के हिमालय क्षेत्र में पर्याप्त निगरानी और परिवर्तन विश्लेषण आवश्यक है, ताकि हिमाचल प्रदेश में भविष्य में ऐसी किसी भी घटना को रोक कर बहुमूल्य जीवन व संपदा को बचाया जा सके। पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Environment, Science and Technology Department) प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की मैपिंग के लिए प्रयासरत है।

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