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#KarwaChauthSpecial: महिलाएं करवाचौथ पर छलनी से क्यों देखती है चांद

चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का रूप माना जाता है

#KarwaChauthSpecial: महिलाएं करवाचौथ पर छलनी से क्यों देखती है चांद

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सुहागिनों का पर्व करवाचौथ ( Karvachauth) कुछ दिनों के बाद आने वाला है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवाचौथ का व्रत किया जाता है। महिलाएं पूरे वर्ष इस व्रत का इंतजार करती हैं। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और जीवन में तरक्की के लिए प्रार्थना करती हैं और निर्जला व्रत करती हैं। शाम को चांद देखने के बाद ही कुछ ग्रहण करती हैं। यह कारण है कि यह सबसे कठिन व्रत में से एक माना जाता है। चांद निकलने के बाद महिलाएं छलनी में पहले दीपक रख चांद को देखती हैं और फिर अपने पति को निहारती हैं। इसके बाद पति उन्हें पानी पिलाकर व्रत पूरा करवाते हैं। क्या आप ने सभी इस बात पर गौर किया है कि करवाचौथ के व्रत में छलनी से ही चांद क्यों देखा जाता है?

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हिंदू मान्यताओं के मुताबिक चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का रूप माना जाता है और चांद को लंबी आयु का वरदान मिला हुआ है। चांद में सुंदरता, शीतलता, प्रेम, प्रसिद्धि और लंबी आयु जैसे गुण पाए जाते हैं. इसीलिए सभी महिलाएं चांद को देखकर ये कामना करती हैं कि ये सभी गुण उनके पति में आ जाएं। चांद देखने की परंपरा करवा चौथ के व्रत की कथा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार चार भाईयों ने अपनी बहन को स्नेहवश भोजन कराने के लिए छल से चांद दिखाया। इसके लिए उन्होंने छलनी की ओट में दीपक जलाया था जो आकाश में चांद की छवि जैसा नजर आया। इससे बहन का व्रत भंग हो गया। इस भूल को सुधारने के लिए उनकी बहन ने पूरे साल चतुर्थी का व्रत किया और जब दोबारा करवा चौथ का समय आया तो उन्होंने पूरे विधि विधान से इसका व्रत रखा। इस तरह उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति हुई। इस बार कन्या ने हाथ में छलनी लेकर चंद्र दर्शन किए थे। छलनी से चांद देखने का रहस्य छल से बचने के लिए छलनी का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल छलनी के जरिए बहुत बारीकी से चांद को देखा जाता है और तभी व्रत खोला जाता है।

 

 

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