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Una: लाखों की नौकरी छोड़ चुनी स्वरोजगार की राह, कईयों को दिया रोजगार

Una: लाखों की नौकरी छोड़ चुनी स्वरोजगार की राह, कईयों को दिया रोजगार

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ऊना। हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना (Una) के एक युवक ने लाखों की नौकरी को छोड़ कर स्वरोजगार की राह को चुना और आज वह लाखों की कमाई कर रहा है। यहीं नहीं इस युवक ने कई लोगों को रोजगार भी प्रदान किया है। हम बात कर रहे हैं जिला ऊना के गगरेट क्षेत्र के एक छोटे से गांव भद्रकाली के युवा रविंद्र पराशर की। रविंद्र पराशर ने बीटेक व एमबीए (MBA) की पढ़ाई की और उसके बाद गुरुग्राम स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी (Multinational Company) में कार्य करने लगे। वहां उनका सालाना पैकेज बीस लाख रुपये था। लेकिन, यहां उनको कुछ सही नहीं लगा। उन्हें नौकरी नहीं अपने गांव में अपने लोगों के बीच कुछ करने की इच्छा थी। जिसके चलते 20 लाख के सालाना पैकेज को छोड़ कर अपने गांव आ गए। यहां आकर मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों से जैविक अगरबत्‍ती बनाने की योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने युवान वेंडर्स नामक कंपनी रजिस्ट्रड करवाई और मुख्यमंत्री स्टार्ट अप योजना के तहत आवेदन कर दिया।


यह भी पढ़ें: Solan के ओच्छघाट की रजनी ने स्वरोजगार से बनाई पहचान, लोगों को भी दिया रोजगार

रविंद्र पराशर ने डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के वैज्ञानिकों की तकनीकी के सहयोग से अपने गांव में अगरबती बनाने की एक यूनिट स्थापित की और जैविक अगरबत्‍ती तैयार करना शुरू कर दिया। धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक समारोहों में प्रयोग होने वाले फूलों का वेस्टेज वह अगरबती के निर्माण में करने लगे। इसके साथ ही वह कंपोस्ट खाद भी तैयार बनाने लगे। देखते ही देखते उनका यह काम चल पड़ा और एक साल में ही उनका टर्नओवर 35 लाख का हो गया। उन्होंने गांव के ही कई लोगों को रोजगार भी प्रदान किया।

रविंद्र पराशर के अनुसार कोरोना काल में जब कंपनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रही थी। उस काल में भी उनका कारोबार खूब फल फूल रहा था। उनके यहां काम करने वाले कर्मचारियों को कोरोना में छंटनी की भी कोई चिंता नहीं थी। उनके उद्योग में बनने वाली अगरबती की मांग अब देश ही नहीं विदेश में भी बढ़ रही है। कोरोना काल में रविंद्र अपनी टीम के साथ शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए डटे हुए हैं। हालांकिए ऑफलाइन मार्केटिंग कुछ समय के लिए बंद थीए लेकिन अब हुए अनलॉक के बाद यही टीम फिर से सक्रिय हो गई है। धीरे-धीरे स्थानीय दुकानों से आर्डर भी मिलना शुरू हो गए हैं। कोरोना के दिनों में भी रविंद्र अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित करते रहे और उनकी हर प्रकार से मदद करते रहे।

रविंद्र पराशर के अनुसार अकसर मंदिरों में फूल चढ़ने के बाद यहां वहां फेंक दिए जाते थे। कई बार इन्हें गंदे नालों व खड्डों में भी बहा दिया जाता है। जिसे देख उन्हें बहुत दुख होता था। उन्होंने इन्हीं फूलों का सदुपयोग करने की ठानी थी जिसके चलते उन्होंने एक साल पहले युवान वेंडर्स नामक कंपनी खोली। उनकी यह सोच काम कर गई और आज इन बेकार फूलों की खूशबू से उनका कारोबार महक रहा है। उनके उद्योग से 25 कर्मचारी जुड़े हुए हैं, जिनमें गांव की महिलाएं भी शामिल हैं। उत्पाद तैयार करने के अलावा मार्केटिंग करने के लिए अलग से स्टाफ नियुक्त किया गया है। वह अपने उत्पाद को ऑनलाइन भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। यही कारण है कि उनकी हर्बल अगरबत्‍ती की अमेरिका, इंग्लैंड के अलावा दक्षिणी एशियाई देश दोहा व कतर में भी मांग है। भारत के बड़े शहरों में भी उन्हें अगरबती के ऑनलाइन (Online) आर्डर मिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि उनकी कंपनी की अगरबत्‍ती की पैकेजिंग ईको-फ्रेंडली है और इसका प्रयोग करने के बाद पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।

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