कांगड़ा: कागज पर मन की आह, नहीं गई स्कूल पर कविता पढ़ कर कहेंगे वाह-वाह 

शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण नहीं कर सकी स्कूली पढ़ाई

कांगड़ा: कागज पर मन की आह, नहीं गई स्कूल पर कविता पढ़ कर कहेंगे वाह-वाह 

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जवाली। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जवाली में रहने वाली वर्षा चौधरी की कहानी इन पंक्तियों से ही बयान होती है, ‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिन के सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’ शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण कभी स्कूल ना जा सकी वर्षा अपने कलाम के बल पर भावों की ऐसी बारिश कराती है कि जो भी उसे पढ़ता या सुनता है भाव विभोर हो उठता है।
28 वर्षीय वर्षा बताती है कि वह शारीरिक रूप से अक्षम है। इसलिए स्कूल नहीं जा पायी। उसने घर में ही पढ़ना-लिखना सीखा। लगभग नौ वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया। शुरू में जब लिखना नहीं आता था तो अपने भाई को बताकर अपने मन के भावों को कागज पर बयां करती थी। फिर धीरे-धीरे लिखना-पढ़ना सीखा। इसके लिये उनकी भाभी ने भी उन्हें हौसला दिया और प्रेरित किया। वर्षा ने बताया कि मैं पोइट्री लिखती हूं और लाइफ में चैलेंज लेने के लिए हमेशा तैयार रहती हूं, मुझे लगता है कि कुछ अच्छा कुछ क्रिएटिव हमेशा होना चाहिए। वर्षा ने आगे कहा कि बचपन से ही मुझे लिखने का बड़ा शौक था और तभी से शौकिया रूप से लिखती रहती थी। अब तक मैंने तीस कविताएं लिखी हैं।
वर्षा ने बताया कि वह अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहती है। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने या लिखने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। वर्षा बताती है कि आप बिना झिझक लिखिए, हर किसी में लिखने की संभावना होती है और उसे व्यक्त करना चाहिए। निश्चित रूप से वर्षा चौधरी एक मिसाल है उन बच्चों के लिये जो  शारीरिक रूप से अक्षम हैं। वर्षा चौधरी के पिता बलदेव राज का कहना है कि हमने अपनी बेटी को ऑल इंडिया कोई भी अस्पताल नहीं छोड़ा लेकिन डॉक्टरों को आज तक इसकी बीमारी हाथ नहीं आए।
उन्होंने आगे बताया कि अब हम इस की सेवा करते हैं और यह होनहार बेटी है बिल्कुल अनपढ़ लेकिन अंग्रेजी हिंदी सब कुछ बोल लेती है। उनका कहना है कि सरकार ने ऐसी आज तक कोई मदद नहीं की यहां तक कि इसे अपाहिज पेंशन भी अब 1 साल हुआ है। सरकार की तरफ से लगी हुई लेकिन दुख की बात है कि जो सरकार बड़े बड़े वादे करती है और मेरी बेटी को आजतक व्हील चेयर अभी उपलब्ध नहीं करवा सकी। आखिर ऐसी सरकारों का क्या करना। वहीं वर्षा चौधरी की माता इसे भगवान की देन बताती हैं। उन्होंने बताया यह शुरू से ही पढ़ने लिखने की रुचि रखती थी। इसे सिर्फ भाई से ही ज्ञान प्राप्त हुआ है यह स्कूल आज तक नहीं गई।
यहां पढ़ें वर्षा द्वारा लिखी गयी कविताएं

*आशा न छोड़ना तुम*

स्याह अँधेरी रात में जुगनू सा जगमगाना तू,
ले आना आशा का सूर्य, इन उदासीन घनेरे बदलों से न घबराना तू,
पपीहे सा प्यासा रेहना, सावन बुझाये प्यास पर तृष्णा न बुझाना तू,
जब-जब हो जीवन में अँधियारा तब-तब आशा का बस एक दीप जलाना तू!
चढ़ना-उतरना, गिरना गिरके संभालना, हज़ारों ठोकरें गिरायेगी तुम्हें,
निराशा की राह दिखाएगी तुम्हें, हर ठोकर पर मुस्कुरा लेना तुम,
दिखे जब भी निराशा, उसे आशा का पता बता देना तुम,
होगा नामुमकिन सा ज़िन्दगी का हर सफर, दिखेंगीं मुश्किलें ही इधर उधर,
बस आशा की डोर थामे हर पहाड़ चढ़ जाना तुम,
हो जाएगी हर मुश्किल आसान,
बस आशा की राह छोड़ निराशा की गली में न चले जाना तुम!
गमों का समंदर डुबा देगा, मझधार में तेरी कश्ती लगा देगा,
रखना यकीन खुदा पे, वो देके आशा का चप्पु, तेरी कश्ती उस पार पहुंचा देगा!
कभी जो गिरो उम्मीदों की शाख से तो आशा का नया बीज ऊगाना तुम,
तकदीर के हवाले न छोड़ना, खुदकी बंजर ज़मीं पे खुदही बरस जाना तुम,
जीवन को सही दिशा सही परिभाषा देना तुम, न रखना किसी से आशा, बस किसी की आशा बन जाना तुम !
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*मैं क्या जानूं*

दूध की पतिली खाली है
मैं कैसे कागज़ पर चाँद बनाऊं।
बेटी भूखी प्यासी है,
घर में रोटी भी तो बासी है,
मैं कैसे झूम के मल्हार सुनाऊं।
बस यूं कर दूं अपनी कलम से सबको दिवाना,
पर कुटिया में रौशनी का दीया कहां से सजाऊं।
फागुन के त्यौहार का नशा मैं क्या जानूं।
पतझड़ में गिरते पत्तों की फड़फड़ाहट की झंकार का मज़ा मैं क्या जानूं,
मेरी तो आंख में गरीबी की बदहाली है,
मां के हाथों में भी तो बदनसीबी के छाले हैं,
बसंत में फूटती नई कूपलों की बहार का समां मैं क्या जानूं,
कहते हो लिख दो कलम से इश्क़-ए-दास्तां में कैसे घुलती है मोहब्बत की फ़िज़ा,
मेरी तो कलम सियाही से खाली है,
मैं कहां से शायरी की बौछार चलाऊं !

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