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अलर्ट : भगवान बचाए इस बीमारी से, संक्रमण हुआ तो मौत निश्‍चित

अलर्ट : भगवान बचाए इस बीमारी से, संक्रमण हुआ तो मौत निश्‍चित

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इंसान और विज्ञान भले ही दिन प्रतिदिन उन्‍नति के नए आयाम स्‍थापित कर रहे हों, मगर अभी भी हमारी पृथ्‍वी पर ऐसे सुक्ष्‍म जीवाणु हैं जो हमारी हर खोज और तकनीक को मात देते नजर आते हैं। ऐसा ही एक वायरस है इबोला (Ebola), जो पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है। अभी तक इसके कारगर ईलाज की खोज नहीं हो पाई है, इस कारण इसके नाम से हर कोई भयभीत है। हाल ही में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ (UNO) के माध्‍यम से विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) ने इबोला को लेकर अंतरराष्‍ट्रीय इमरजेंसी (International Emergency) की घोषणा की है। अभी तक इसका कहर अफ्रीका में देखा जा रहा था, मगर माना जा रहा है कि यह जानलेवा वायरस (Virus) पूरी दुनिया को लपेटे में ले सकता है।

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ज्ञात रहे कि इबोला एक उच्च संक्रामक वायरस है। इससे संक्रमित होने वाले व्‍यक्ति के मरने (Death) की संभावना 90 फीसदी तक हो जाती है। इन दिनों कांगो में इसका कहर फैला हुआ है और यहां इस बीमारी के कारण 1550 से अधिक लोग मौत का शिकार हो चुक हैं। यह बीमारी युगांडा से यहां तक पहुंची है। इबोला वायरस रोग (EVD) पहले इबोला रक्तस्रावी बुखार के रूप में जाना जाता था। यह वायरस जंगली जानवरों से लोगों में फैलता है। फ्रूट बैट यानी चमगादड़ इबोला वायरस का प्राथमिक स्रोत हैं। इबोला वायरस दो से 21 दिन में शरीर में पूरी तरह फैल जाता है। इसके संक्रमण से कोशिकाओं से साइटोकाइन प्रोटीन बाहर आने लगता है और कोशिकाएं नसों को छोड़ने लगती हैं। इसे चलते कोशिकाओं से रक्‍तस्राव होने लगता है। इबोला दो से 21 दिनों में पूरे शरीर में फैल जाता है। इसका पता वर्ष 1976 में दक्षिण सूडान और कांगो में पहली बार उस समय चला जब इबोला नदी के पास एक गांव के लोगों को इसने चपेट में लिया। इबोला नदी के कारण ही इसका नाम इबोला रखा गया था।

अभी तक इस वायरस से निपटने के लिए कोई प्रमाणिक इलाज नहीं है। इससे बचाव के लिए टीके विकसित किये जा रहे हैं। मरीज के खून, पसीने के संपर्क से और छूने से भी यह वायरस फैलता है। महामारी वाले इलाके के पशुओं के संपर्क से भी यह फैलता है। इबोला के संक्रमण से मरीज के जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द होता है, त्वचा पीली पड़ जाती है, बाल झड़ने लगते हैं. ते, रोशनी से आंखों पर असर पड़ता है, पीड़ित मरीज बहुत अधिक रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पाता, आंखों से जरूरत से ज्यादा पानी आने लगता है. तेज, बुखार आता है, साथ ही कॉलेरा, डायरिया और टायफॉयड जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

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