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इसरो ही नहीं अन्‍य स्‍पेस एजेंसियां भी करती हैं टोटके, रूसी पेशाब करते हैं तो अमेरिकी खाते हैं मुंगफली

इसरो ही नहीं अन्‍य स्‍पेस एजेंसियां भी करती हैं टोटके, रूसी पेशाब करते हैं तो अमेरिकी खाते हैं मुंगफली

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बेंगलुरु। हाल ही में कुछ लोगों की तरफ से हर मिशन के लॉन्च से पहले तिरुपति बालाजी मंदिर जाकर पूजा करने की परंपरा की आलोचना सुनी गई थी। इस बार भी चंद्रयान-2 मिशन की लॉन्चिंग से पहले ऐसा किए जाने की संभावना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वैज्ञानिकों के लिए ऐसी आस्थाएं या अंधविश्वास (superstitions) ठीक हैं। इसके बारे में भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक सीएनआर राव कहते हैं कि उन्हें इसरो की पूजा की परंपरा ठीक नहीं लगती, लेकिन ये इसरो वैज्ञानिकों का अपना निर्णय है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इसी जुलाई की 15 तारीख को अपने चंद्रयान-2 मिशन को लॉन्च करेगा। इसरो के वैज्ञानिक रॉकेट लॉन्च से पहले तिरुपति बालाजी मंदिर में जो पूजा करते हैं वह भी बड़ी रोचक होती है। इसमें ये वैज्ञानिक राकेट का छोटा सा मॉडल मंदिर में चढ़ाते हैं ताकि उन्हें मिशन में सफलता मिले। ऐसे टोटके करने वाला इसरो अकेला नहीं है। दुनिया की बड़ी-बड़ी स्पेस एजेंसियां (Space Agencies) जिनमें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और रूसी स्पेस एजेंसी भी शामिल हैं, इनके साथ दुनियाभर के बहुत से वैज्ञानिक ऐसे कई अंधविश्वासों पर भरोसा करते हैं।


मंगलयान प्रोजेक्ट के समय भी इसरो के वैज्ञानिकों ने मिशन की लॉन्चिंग से पहले कई टोटके आजमाए थे। इनमें से एक था कि जब-जब मंगलयान की कक्षा में बदलाव किया जाता था। मिशन के निदेशक एस अरुणनन मिशन कंट्रोल सेंटर से बाहर आ जाते थे। एक बार उन्होंने एक अंग्रेजी अख़बार से बातचीत में कहा भी था कि वह इस प्रक्रिया को देखऩा नहीं चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा था कि आप इसे अंधविश्वास कहें या कुछ और लेकिन इससे मिशन सफल हुआ। एक मजेदार बात यह भी है कि जिस वक्त मंगलयान की लॉन्चिंग होनी थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसरो गए हुए थे और प्रधानमंत्री (PM) का प्रोटोकॉल होने के चलते कोई भी व्यक्ति मिशन कंट्रोल रूम के अंदर से बाहर नहीं जा सकता था, लेकिन जब एस अरुणनन ने अपने इस विश्वास के बारे में बताया तो उन्हें कंट्रोल सेंटर से अंदर और बाहर जाने की अनुमति दी गई।

 

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रूसी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को कॉस्मोनॉट्स कहा जाता है। उनके बीच कई सारे अजीबो-गरीब अंधविश्वास प्रचलित हैं, जो वे मिशन की लॉन्चिंग के पहले करते हैं। रूसी कॉस्मोनॉट्स स्पेसक्राफ्ट्स पर चढ़ने से पहले खुद को लॉन्चपैड तक ले जाने वाली बस के पहिए पर पेशाब करते हैं। दरअसल 12 अप्रैल, 1961 को रूसी कॉस्मोनॉट यूरी गागरिन दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री बने थे, लेकिन इस यात्रा पर जाने से पहले वह बेहद बेचैन थे। इसी बीच उन्हें बहुत तेज पेशाब लग गई। उन्होंने बस रुकवाई, उसके पीछे गए और बस के पिछले दाहिने ओर के पहिए पर ही पेशाब कर ली। जब उनका मिशन सफल रहा तो अन्य कॉस्मोनॉट्स ने उनके इस कदम को टोटके के तौर पर फॉलो करना शुरू कर दिया।  अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा जब भी कोई मिशन लॉन्च करती है तो जेट प्रोप्लशन लैब में बैठे वैज्ञानिक मूंगफली खाते हैं। 1960 के दशक में नासा का रेंजर नाम का मिशन 6 बार फेल हुआ था। इसके बाद जब सातवां मिशन सफल हुआ तो पाया गया कि लैब में बैठा एक वैज्ञानिक मूंगफली खाने में लगा हुआ था। अन्य वैज्ञानिकों ने माना कि मिशन के सफल होने की वजह उस वैज्ञानिक का बैठकर मूंगफली खाना भी रहा। इसके बाद से वहां यह प्रथा चली आ रही है।

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