एक रात के साथी

एक रात के साथी

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अजीब सी हालत में फंस गए थे सब लोग। कांगड़ा से बस चली थी, तो सिर्फ तेज बारिश थी, पर यह कोई नई बात नहीं थी। ऐसा तो रोज ही होता था। लोग बस में बैठ कर चल दिए थे, किसी को भी अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला था।
वंदना के आगे वाली सीट पर एक युवा जोड़ा था। नन्हा बच्चा गोद में था और उनकी चुहलें जारी थीं। पुरुष अपनी किसी कामयाबी की डींगें मार रहा था और बीवी मुस्कराए जा रही थी। तीन किलोमीटर जा कर बस एक झटके के साथ रुक गयी।
-क्या हुआ ? किसी ने पूछा।
-कुछ नहीं चैकिंग के लिए रोका है। अपने-अपने टिकट संभाल लो। कहता हुआ कंडक्टर बस से नीचे उतर गया।
सभी ने टिकट दिखा दिए , उस जोड़े की बारी आई….. लड़का अपनी जेबें टटोलने लगा। टिकट वहां नहीं था। उसने एक-एक जेब खंगाल ली।
-अब क्या कपड़े उतार कर देखोगे ? टिकट ली भी थी? ऑफिसर कुछ सख्त हो कर बोला।
-ली तो थी, पर कहीं गिर गई। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
-कोई बात नहीं, जुर्माना भर दो और दूसरी टिकट ले लो। कह कर वह टिकट काटने में व्यस्त हो गया।
बस के बाहर ये सब चल रहा था और उसकी बीवी निर्लेप भाव से खिड़की से देख रही थी। थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी। अब लड़का खामोश था ,उसकी चुहलबाजी कहीं खो गयी थी।
वंदना ने पूरी बस में नज़र दौड़ाई ,एक मां अपने बच्चे को थपकियां दे कर सुला रही थी ,उसी के बगल में एक बूढी औरत नींद से भरी आंखों को बार-बार बंद कर रही थी।
बस तुनुहट्टी स्टॉप पर जा कर रुक गयी।
-उतरो भाई लोगों बस आगे नहीं जाएगी ,बर्फ गिर गयी है ,रास्ता बंद है. कहता हुआ ड्राइवर उतर कर बस से बाहर हो गया। लोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे।
-क्या सचमुच बस आगे नहीं जायेगी ? किसी ने साहस कर पूछा था।
-नहीं जी चंबा तक इसी तरह बर्फ फैली है।
कंडक्टर और ड्राइवर दोनों ही किसी ढाबे के अंधेरे में गुम हो गए। जाहिर था कि अब सवारियों को भी उतरना ही था।
सामने दूर-दूर तक सिर्फ बर्फ का नजारा था घर,पेड़, दुकानें और सड़क मानो सब बर्फ के ही बन गए थे।
इस स्थिति की शायद किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। सिर से पांव तक गर्म कपड़ों में लिपटी महिलाएं भी एकबारगी सहम कर रह गईं। स्कूल में यहां वंदना की पोस्टिंग नई थी, मैदानी इलाके की होने के कारण वह यहां के मौसम से बिल्कुल अनजान थी। अब जो मुसीबत सामने थी उसमें, उसके हल्के गर्म कपड़े साथ नहीं देने वाले थे।
और अब…?
अब बर्फ में सारे ही रास्ते खो गए थे। लोगों को आगे बढ़ता देख कर वंदना ने भी अपना भारी बैग कंधे पर लिया और आगे चल पड़ी। सफ़ेद बर्फ में पावं धंसने लगे थे थे, पता ही नहीं चलता था कि सड़क का किनारा कहां है। बर्फ ने बड़े ही अनोखे स्टाइल में अपने किनारे बना लिए थे। बच्चे किलकारियां मारते एक दूसरे पर बर्फ उछालने लगे और माएं उन्हें संभालने में व्यस्त हो गईं।
एक किलोमीटर चलने के बाद वंदना की हिम्मत पस्त हो गई। उसकी वेलवेट की जूतियों में ठंडक की नमी भर गई थी। कंधे पर लटका बैग उसने उतारना चाहा ,तो अचानक उसकी नजर पीछे चली गयी। उसके पीछे दूर -दूर तक कोई नहीं था। बर्फ गिरनी तो बंद हो गई थी, पर दिन के चार बजे ही जैसे अंधेरा छा गया था।
एकदम निर्जन सन्नाटा,….
एक अनजानी दहशत से वह सड़क के बीच में ही जैसे जड़ हो कर खड़ी हो गई।
हुआ यह था कि आसपास के इलाकों में लगभग सभी एक दूसरे को जानते थे इसलिए जिसको जहां ठिकाना मिला था, चला गया था। दस मिनट बाद सड़क पर तीन लोग आते दिखे जो संभल-संभल कर पैर रख रहे थे। पास आने पर वंदना ने उन्हें देखा। उनमें एक सरदार था, जिसने भारी बोरी उठाई हुई थी,बाकी दोनों की पीठ पर भी भारी बैग थे।
-आप अकेले कैसे खड़ी हैं, रास्ते में कहीं रुक जातीं।
-मैं यहां किसी को जानती नहीं और कोई फैमिली होटल भी नहीं दिख रहा।
-होटल, वे जोर से हंस पड़े ,कोई घटिया चाय की दुकान मिल जाय वही बहुत है। हां, अगर चलते रहे तो बाथरी का रेस्ट हाउस आ जाएगा।
-पर दोस्तों दिल्ली अभी दूर है। सरदार खिलखिला उठा
-सबसे पहले हम आपको अपना परिचय देते हैं , उनमे से एक बोला। मैं रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर हूं , यह सलूणी टेलीफ़ोन एक्सचेंज में काम करता है और हमारे सरदार जी रिटायर्ड फौजी हैं। इसलिए हमें तो थकन लगने वाली नहीं, जहां तक जा सकेंगे, जाएंगे। बस तो इस सड़क पर अब आएगी भी नहीं।
-मैं भी आप लोगों के साथ चलूंगी वंदना ने कहा।
-स्वागत है ,तीनों ने एक साथ कहा।
अब वे चार थे, सरदार जी सबसे आगे थे बोरी उनके सर पर अब भी थी। वे सब जैसे वक्त काटने के लिए कहानियां सुनाने लगे कि कैसे इससे पहले भी वे ऐसी मुसीबतों में फंस चुके थे।
रात बेहद ठंडी थी ,आसमान बादलों से साफ था और पूरे चाँद की चांदनी जैसे बर्फ के साथ आंख मिचौली खेलने आ गई थी। उसने घड़ी देखी ,तीन घंटे उनको चलते हुए हो चुके थे। सरदार जी के कंधे पर अब भी बोरी थी और वे उसे सेट करने में लगे थे।
-आप इस बोरी में क्या ले जा रहे हैं ? वंदना ने हंसते हुए कहा।
-इसमें गेहूं का आटा है, मैं जब चम्बे से जाता हूं तो मक्की का आटा ले जाता हूं और घर से आते वक्त गेहूं का आटा ले आता हूं।
-क्यों , क्या यहां गेहूं का आटा नहीं मिलता ? वंदना मुस्कुराई.
-घर वाली बात यहां कहां ?
-और इसीलिए यह बोरी ढोए जा रहा है दूसरे ने कहा और वे सभी हंस पड़े।
-तुम लोग तो मेरे पीछे हाथ धो कर ही पड़ गए।
– ठंड इतनी है कि चाय पीने का दिल कर रहा है। क्या इस रास्ते में कोई दुकान नहीं? एक ने कहा
-शायद एक किलोमीटर आगे है दूसरे ने जवाब दिया और फिर ख़ामोशी छा गयी।
सचमुच आगे चाय की दुकान थी।  वे रुके, चाय पी और उठ खड़े हुए..
-कहां जाना इतनी रात में, यहीं रुक लो एक कमरा है चालीस रुपए लगेंगे चाय वाले ने कहा।
-क्या कहते हो सरदार जी ? सलूनी वाला मुड़ा।
-चुप रहो , रात को पता चला , गला दबा दिया और मालमत्ता ले कर चलते बने। अब चालीस रुपए में तो हम मरने से रहे , फिर यह मत भूलो कि हमारे साथ एक लेडीज भी है।
-ठीक कहते हो। आगे एक रेस्ट हाउस भी है वहां तक पहुंच जाएं फिर देखते हैं।
वे चारों बाहर निकल आए। इंस्पेक्टर अब चांदनी को देख कर कोई गीत गुनगुना रहा था। सरदार ने फिर बोरी कंधे पर उठा ली थी।
-सरदार, तू ये बोरी फेंक क्यों नहीं देता ?उसे देख कर टेलीफोन ऑपरेटर हंसा
-देख भाई , मैं ठहरा पुराना फौजी, आदत ही पिट्ठू लादने की रही है, हां तुम दोनों को अपने बैग भारी लग रहे हों, तो खाई में फेंक दो और हलके हो जाओ।
-गुस्सा क्यों होता है मेरे भाई , लादे रह अपना पिट्ठू। इंस्पेक्टर हंस दिया।
-आगे तो बर्फ ही बर्फ है ,इससे अच्छा था कि हम लौट ही जाते। वंदना थकान से चूर थी।
-पीछे भी उतनी ही बर्फ है आगे चलेंगे तो रास्ता कटेगा। इंस्पेक्टर ने कहा और चुप हो गया।
आधे घंटे का सफर और तय करने के बाद बाथरी का रेस्ट हाउस दिखाई दिया। यह काफी ऊंचाई पर बना था और वहां तक जाने वाली सड़क पर बर्फ की मोटी तह जमी हुई थी। ढलान की चढ़ाई चढ़ते उनके छक्के छूट गए। किसी तरह वे ऊपर पहुंचे ,कम्पाउंड में दो गाड़ियां पूरी तरह बर्फ से ढकी दिखाई दीं। मुख्य दरवाजा बंद था ,अंदर किसी कमरे में रोशनी नहीं थी। शायद बिजली जा चुकी थी। हां, किनारे वाले कमरे की खिड़की से मोमबत्ती का कोमल प्रकाश झांक रहा था।
उनके बार-बार आवाजें लगाने पर चौकीदार ने खिड़की से झांका, उसके चेहरे पर सख्त नागवारी के भाव आए।
-जगह नहीं है। कह कर उसने फटाक से खिड़की का दरवाजा बंद कर दिया…
-यह क्या बात हुई, हम भी थके हुए हैं सर छिपाने को जगह मिल जाए , तुम्हारा किराया चुका देंगे। सरदार ने ऊंची आवाज में कहा।
चौकीदार ने भुनभुनाते हुए दरवाजा खोला पर वंदना को देख कर चुप रह गया। वे तीनों एक दूसरे को देख कर हंसे और अंदर दाखिल हो गए। अब वे हॉल कमरे में थे जहां सोफे और सैटी लगे हुए थे। सभी ने अपने-अपने ठिकाने ढूंढ लिए। चौकीदार उनके लिए चाय बना रहा था, कपडे़ बदल कर वे स्टोव पर ही हाथ सेंकने लगे।
सरदार ने बोरी में से टिफिन का डिब्बा निकाला, आलू के पराठे गर्म किये और एक-एक टुकड़ा अचार के साथ उन सब को बांट दिया।
– भाई लोगों परांठे तो मेरी बीवी ने मेरे लिए बनाए थे , पर मुसीबत की इस घड़ी में हम मिल बांट कर खा लेते हैं।
-पराठे किसने बनाए और किन्होंने खाए ? वंदना मुस्कराई।
-और कहां खाए ? यह भी तो सोचो,… सलूणी वाले ने कहा और वे ठहाका मर कर हंस पड़े।
बगल के कमरे का दरवाजा खुला और एक व्यक्ति बाहर आया। शायद वह उनकी तेज हंसी से जग गया था।
-वेयर डू यू कम फ्रॉम ?
-अरे हम इसी एरिया के हैं रास्ते में बर्फ गिर गयी तो फंस गए।
-आपके साथ ये मैडम भी हैं, परेशान होंगी हमारे कमरे में दो बेड हैं एक हम इन्हें दे सकते हैं , मैं मेरा दोस्त एक पर ही सो जाएंगे।
वे तीनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे। असमंजस और अविश्वास का भाव उनके चेहरों पर था।
-नो थैंक्स सर , मैं अपने साथियों के साथ ही रहूंगी वंदना ने हंस कर कहा। उस आदमी ने अपने कमरे के अंदर जा कर दरवाजा बंद कर लिया। तीनों ने जैसे राहत की सांस ली और आपस में बातें करने लगे।
– तुम लोग साथ देते तो चांदनी रात थी हम सब चले चलते सरदार ने कहा।
– अब तेरे जैसा बूता सबके पास नहीं है सो जा चुपचाप। इंस्पेक्टर ने उसे झिड़की दी।
चौकीदार दो कम्बल रख गया।
– जाने से पहले कम्बल वापस कर जाना। उसने उनकी ओर तीखी नजरों से देखते हुए कहा।
-ओए कमाल हो गया जी , हम क्या तेरा कम्बल चुरा कर ले जाएंगे? सरदार चिढ़ गया।
– किसी का क्या पता होता है ,कई बार ऐसा हो चुका है। कहता हुआ वह कमरे से बाहर हो गया. .
तीनो हंसने लगे ,उन्होंने एक कम्बल वंदना को दे दिया और दूसरे में गुड़ीमुड़ी होकर जमीन पर बिछी कालीन पर ही सो गए।
कम्बल अपने चारों ओर लपेटे वंदना खिड़की से बाहर देख रही थी. शीशे के पार अब भी बर्फ़बारी हो रही थी। एक भूला हुआ सपना जैसे उसकी आँखों में कौंध गया। कभी उसने सोचा था, किसी रेस्टहाउस में रुक कर चांदनी रात में बर्फ़बारी देखेगी और आज उसका बाहर देखने तक का मन नहीं हो रहा था।
सुबह उठ कर चारों ने अपने-अपने हिस्से के पैसे मिला कर चौकीदार को दिए और बाहर निकल आए। असली मुश्किल अब सामने थी, बर्फ सख्त हो चुकी थी। पैर रखते ही फिसला तो वंदना डर गई। अचानक सलूणी वाला गिरा और फिसलता ही चला गया
– अरे यार यह तो ब्रेक ही नहीं लग रही है वह चीखा। शरीर से थोड़ा भारी था इसलिए उसने नीचे ही जा कर दम लिया।
-मैं नहीं जाऊंगी वंदना डर गई थी
-आप मेरा हाथ पकड़ लीजिये और कड़ी बर्फ पर पांव रखिए इंस्पेक्टर ने कहा । धीरे -धीरे वे नीचे उतरे। सरदार जी पहले ही बोरी ले कर उतर गए थे और नीचे उनका इंतज़ार कर रहे थे। सामने समूचा एरिया ही बर्फ का रेगिस्तान बना हुआ था। एक घंटे तक संभल कर चलने के बाद उन्हें एक बस नजर आई। वहां और भी गाड़ियां फंसी हुई थीं। वंदना बस में बैठ गई। उन तीनों ने अपना सामान अगली सीट पर रख दिया और नीचे उतर गए। अब उनके पास पूरा दिन था,खुली धूप वाला चमकता दिन। थोड़ी देर बाद बस रवाना हो गयी वे तीनों भी अंदर आ गए। उनमे से एक बस के ऊपर चढ़ कर ताज़ी बर्फ उठा लाया था। उसमें गुड़ मिला कर उन्होंने बर्फ के गोले बनाए और एक वंदना को भी दिया।
अगली सीट पर बैठे वे तीनो स्कूली बच्चो की तरह बर्फ के गोले खाते हंस रहे थे।
एक-एक स्टॉप आता गया लोग उतरते गए। उन तीनो में सबसे पहले सलूणी वाला गया, फिर इंस्पेक्टर का स्टॉप आया। बालू पुल पर सरदार उतरने से पहले वंदना के पास आया।
-मैंने किसी को नहीं बताया था, कि मेरी बोरी में बेसन के लड्डू भी थे ,वरना ये सारा खा जाते। वे थोड़े से आपके लिए। कागज में लपेटे लड्डू उसे थमा कर वह नीचे उतर गया। जाने से पहले वे एक दूसरे से गले मिल कर विदा लेना नहीं भूले थे और वंदना से भी मिल कर ही गए थे। आखिरी स्टॉप वंदना का था, उसे जीरो पॉइंट पर उतरना था। उसने आगे की सीट की तरफ देखा , सीट नर्म थी इसलिए उनके बैठने की जगहों पर हल्के गड्ढे बने थे और सीट पर उनके कपड़ों की नमी अभी भी फैली थी।
-प्रिया आनंद


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