मैदान

मैदान

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हमारी आदत सी है कि हम अक्सर ही कुछ कहीं रख कर भूल जाते हैं। कभी-कभी कुछ यादें भी पुराने खतों की तरह और एक दिन जब कुछ ढूंढने लगते हैं तो जाने कितनी यादों की खिड़कियां खुल जाती हैं. .
कभी भी न भूलने वाली यादें, जिनका रंग कभी फीका नहीं होता। जैसे पहले प्यार के एहसास में डूबी कोई शाम , अस्त होते सूरज की रोशनी, पंछियों की आवाजें और महकती सांसों की अनुभूति।
बारिश घिर कर आ गयी थी। लगता था जैसे आसमान और धरती के बीच एक चादर सी तन गई हो। शुभा ने उठ कर खिड़की से पर्दा हटा दिया। बारिश की फुहार उसका चेहरा भिगो गई।
पहाड़ों पर तेजी से बर्फ गिर रही थी।
मोबाइल की सुरीली धुन से वह चौंक गई, कोई मैसेज आया था।
मैसेज तन्मय का था।
– सूनी सड़क पर तेज बारिश है, सामने का मैदान पानी से तर-बतर जब भी ऐसा मौसम होता है, मैं अपने बचपन में लौट जाता हूँ। डांसिंग इन द रेन.. विदाउट एनी केयर।
शुभा हाथ में मोबाइल लिए खड़ी रह गई।
वह हर सुबह इसी तरह मैसेज भेजता था। उसकी बातों में अक्सर किसी मैदान का जिक्र होता था। मौसम के साथ-साथ उस मैदान के दृश्य बदलते रहते थे। गर्मियों में वहां तेज धूप होती, बरसात में झमाझम बारिश से पूरा मैदान भीगता रहता था और जाड़ों में उस मैदान में धुंध रहती थी जो टहलने वालों के चेहरे को नमी बन कर छू जाती थी।
वह ऐसा मैदान था जिसे शुभा ने कभी नहीं देखा था , पर तन्मय की आंखों से देख लिया था।
जाने क्यों उसे लगता था कि तन्मय उस मैदान के आस-पास ही कहीं रहता था और उस घर की कोई खिड़की जरूर उस मैदान की तरफ खुलती थी जिसके जरिए वह मौसम के बदलते रंग देखा करता था।
तन्मय का भेजा हर मैसेज वह अपनी डायरी में नोट कर लेती थी, वह भी दिन तारीख और समय के साथ। वह जान भी नहीं पाई, कि कब मोबाइल से उतर कर एक पूरी दुनिया उसकी डायरी में आ समाई थी.. वह मैदान जैसे ख्वाबों की ताबीर बन कर रह गया था। वे हलचलें देख कोई और रहा था , पर उसकी आंखें जैसे शुभा की आंखे बनी हुई थीं।
तन्मय, क्षय का बेहद प्यारा दोस्त एक दम छोटे भाई जैसा, पर उसकी जिंदगी दुःख-दर्द की लम्बी दास्तां थी। फ़क्क़ड था तन्मय, कहीं भी टिक कर न बैठने वाला, पर एक बार भी किसी के घर चाहे एक घंटे के लिए ही चला जाता तो भुलाए न भूलता। फिर शुभा के पास तो एक महीने रह कर गया था। तब पहली बार जाना था शुभा ने, कि किसी-किसी के भाग्य में दुःख लिख कर मिलता है। उसका घर था, पर वह वहां जाता ही नहीं था , किसी से प्यार किया था तो उस लड़की की शादी कहीं और हो गई थी। वह अक्सर बीमार रहता था , पर दिखाता यही था कि उसे कुछ नहीं हुआ।
उसकी आंखों की शार्पनेस , उसकी प्रखर बौद्धिकता शुभा को हैरान कर देती थी। अक्षय के साथ खुल कर ठहाके लगाता , उसने कभी इस बात का जिक्र भी नहीं किया कि कब, कौन चुपके से उसे तकलीफ का टुकड़ा थमा गया।
जब भी आता, घर में रौनक हो जाती थी। शुभा की बेटी शामली हर वक्त उसकी उंगली थामे रहती थी। वे दोनों मिल कर पौधे रोपते, कितने ही तरह के फूलों के पौधे। आम-अमरूद के पौधे वह जाने कहां से ढूंढ कर लाया था। शामली ने उनके नाम भी रखे थे – यह दादू का पेड़, यह पापा का और वह शामली का पेड़।
वह चला गया था और शुभा उन पौधों में रोज पानी देती थी।
बूंदों की रिमझिम, पतझड़ की खुश्क हवा और फूलों से सुगन्धित वासंती वातावरण जैसे तन्मय की यादों को साथ ले कर चलता था।
जानें क्यों शुभा को लगता था कि तन्मय का बहुत कुछ ऐसा है जो अनकहा है।
पर वह अनकहा क्या था?
मोबाइल से उसके छोटे आग्रह शुभा तक पहुंचते रहते थे। वह वहां उस घर में नहीं था , पर उसकी उपस्थिति हर जगह थी। शुभा को उसमें और शामली में कोई फर्क नहीं लगता था, पर तन्मय ?
उसकी जिंदगी तो कटी पतंग की तरह हवा के सहारे दिशाएं बदलती रहती थी।
वे गर्मियों के दिन थे, वह अचानक ही आया और आते ही सीधे किचन में चला आया।
-मुझे कुछ अच्छा सा बना कर खिला दो काफी दिन हो गए घर का खाना खाए हुए . . .
– शादी कर लो रोज अच्छा खाना मिलेगा।
-मैं ? दो बच्चों का बाप हूँ , मुझसे शादी कौन करेगी?
– अब ये बच्चे कहां से आ गए ?
-एक बेटा मेरी प्रेमिका का है और दूसरी ये शामली। हैं न मेरे दो बच्चे ?
-बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। शुभा हंस पड़ी।
उस रात अक्षय और तन्मय देर तक जाग कर पुरानी यादें ताजा करते रहे।
बहुत कुछ तन्मय में ऐसा था जो उसे जेहादी बनाता था। उसकी आंखों में आग थी और बातों में व्यवस्था के प्रति तुर्शी। उसके दोस्त उसे कामरेड कहते थे पर वह दिल से किसी मासूम बच्चे जैसा ही था। दूसरे दिन की शाम , शुभा बाजार से आई तो वह आंगन में खाट पर लेटा आसमान के तारे गिन रहा था।
– वो टूटा तारा। मांगो, कोई विश मांगो शामली , तन्मय बोला। .
-मेरी विश कब्बी पूरी नहीं होगी, शामली ने निराश भाव से कहा।
-वह क्यों ?
-इसलिए कि मैं परी बनकर पूरी दुनिया की सैर करना चाहती हूं।
-लेकिन परियां तो होतीं ही नहीं।
– होती हैं , होती हैं ममा ने मुझे परियों की कहानी सुनाई थी.. शामली तुनक कर बोली।
-तेरी ममा, अब उसकी बुद्धि को क्या कहें। वह उसकी ओर देख कर मुस्करा दिया।
-तन्मय तुम्हारा नाम किसने रखा, सुंदर है। वह उसके पास बैठ गयी।
-मां ने.. वैसे यह आजकल बेहद डैशिंग नाम माना जाता है।
-गुड , कॉफी लोगे या चाय ? यहां की लोकल चाय का फ्लेवर बहुत अच्छा होता है . . .
– उसमे थोड़ी स्ट्रांग पत्ती डाल देना , मुझे बिना रंग की चाय अच्छी नहीं लगती, कह कर वह शामली के साथ खेलने लगा ।
-तुम लोगों के पौधे तो बड़े हो गए। शुभा ने चाय का प्याला उसे थमाते हुए कहा ।
– हां सो तो है , पर मुझे अपने यहां के पेड़ ज्यादा अच्छे लगते हैं। चौड़ी सड़कें और उनके किनारे पीले फूलों से लदी अमलतास की डालियां , लाल फूलों में झूमता गुलमोहर। वो बात यहां कहां ?
हमारे घर के सामने नीम का दरख़्त था.. नीम के फूल खिलते तो हवा मदमस्त हो जाती थी, फिर टप-टप गिरतीं निमकौरियां। उसके चेहरे पर एक छाया आकर गुजर गई।
– मैं कभी यूपी नहीं गई , पर मैं ताजमहल देखना चाहती हूं।
– आह , यहीं तो मारे गए हिन्दोस्तानी। यूपी में सिर्फ ताज ही थोड़े है, बनारस की सुबह , इलाहाबाद में त्रिवेणी का संगम, नीली दिखती यमुना या फिर लखनऊ का हज़रतगंज , वहां का रॉयल कैफे, लैम्प शेड्स से छन कर आती रौशनी और धीमे स्वर में बजती कमसेप्टेम्बर की धुन.. मैं और मेखला वहां जाया करते थे। कहते-कहते वह खामोश हो गया।
-मेखला, बड़ा अनोखा सा नाम है कुछ बताओगे उसके बारे में।
– वह आर्मी ऑफिसर की बेटी थी., उसका जन्म असम में हुआ इसलिए उसके पापा ने उसका नाम मेखला रख दिया। हम साथ ही पढ़े और बड़े होते-होते जाने कितने सपने बुन लिए। मेखला को पाने के लिए मेरा बड़ा आदमी होना जरूरी था। मैं स्कॉलरशिप ले कर अमेरिका चला गया। लौट कर आया तब तक मेरी दुनिया लुट चुकी थी. . .
शुभा ने धीरे से उसका माथा छुआ, . तन्मय की आंखों में आंसू नहीं थे , पर उनकी शून्यता बहुत गहरी थी।
-तुम एक नॉर्मल जिंदगी तो जी ही सकते थे ? शुभा का स्वर धीमा था।
-मेरे पास जीने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।
अंधेरा और भी गहरा हो गया था…… दोनों ही खामोश थे। शुभा जान गई थी कि तन्मय एक ऐसे मुकाम पर आ गया था, जहां से उसका वापस लौटना नामुमकिन था।
शायद वह जिंदगी भर किसी दूसरे के घर में मेहमान रहेगा , खिड़की से मैदान की हलचल देखता हुआ अपने शहर के गुलमोहर और अमलतास को याद करता हुआ।
घर से निकल जाना तो आसान है , पर इंसान अपनी जड़ें तो वहीं छोड़ आता है।
अब तो शुभा को भी पता चल गया था, कि उस मैदान से निकल कर कोई भी रास्ता कहीं भी, किसी घर तक नहीं जाता था।


-प्रिया आनंद

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