नीली यमुना…बचपन की यादें

नीली यमुना…बचपन की यादें

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Childhood memories : तरंग को भाई का खत मिला तो वह आश्चर्यचकित रह गई थी । भाई फोन भी तो कर सकते थे फिर खत क्यों…? उसने खत खोला तो हंसी आ गई। इलाहाबाद की कुछ प्रापर्टी थी जिसकी देख-भाल नहीं हो पा रही थी। आई ने उसे बेचने का तय किया था और चाहता था कि वह भी आकर अपना हिस्सा ले ले। इसी के साथ वह यह भी चाहता था कि तरंग एक हफ्ते के लिए इलाहाबाद आ जाए तो दोनों बचपन की यादें ताजा कर लेंगे। उसने नीलेश को खत दिखाया तो उसने हां कर दी । तरंग तैयारियां करने लगी पर मन जैसे सपनों में डूब गया। बचपन की यादें इतनी सुंदर …इतनी स्वप्निल कि कभी भूलीं ही नहीं। शहर की भीड़भाड़ से अलग एकांत  में उसका घर। घर के सामने नीम का छतनार पेड़ था। मौसम में नीम के फूलों की मस्त महकऔर फिर रात के सन्नाटे में टपकती निमकौरियां…। जिंदगी का यह ऐसा हिस्सा था जिसे अलग कर के जिंदगी को देखा ही नहीं जा सकता था।
जब भी इलाहाबाद जाना होता,तरंग सबसे ज्यादा खुश रहती। ट्रेन धड़-धड़ करती पटरियों से  गुजरती जाती और खिड़की के बाहर उतनी ही तेजी से  गांव घर पेड़-पौधे  और बिजली के खंभे भागते दिखाई देते थे। सिगनल की लाल -हरी बत्तियां किसी राक्षस की आंखों की तरह ही नजर आती थीं। दूर इलाहाबाद शहर की जगमग करती रोशनी…आयरन ब्रिज और उसपर जाती हुई रेल। घर इतने अकेले में था कि रात को आसपास घूमते भेड़ियों की आवाजें सन्नाटे में गूंजतीं तो वह डर जाती। एक बार पापा से पूछा भी था कि इतने सन्नाटे में घर बनवाने का क्या तुक था। पापा हंस दिए थे कहा- हमारे पूर्वजों को ऋषियों-मुनियों की तरह एकांत में रहने का शौक था।
घर के पास ही समुद्रकूप था जिसके पास की रेत में बच्चे सारा दिन शंख-सीपियां चुनते रहते थे। एक दिन उसकी बड़ी बहन मालू ने बताया था कि वहीं, कहीं खजाना गड़ा था।
-सोच तरंग अगर कहीं वह खजाना हमें मिल जाए मालू उत्साहित थी।
-किसने कहा तुमसे…? तरंग चिढ़कर बोली थी।
-पता है मुझे … गुरू और वसु ने बताया था। मालू यानी कि मालविका  हमेशा ही ऐसी बातों की खबर रखती थी जो अक्सर उसे नहीं पता होती थीं। एक दिन इस खजाने वाली कथा का भी पटाक्षेप हो गया। नदी में बाढ़ आई थी सभी वहां देखने गए अचानक ही कगार कटी  और दो मिट्टी की हंडियां बाहर आ गईं उनमें मुंह तक कौड़ियां भरी हुई थीं।
-वाह मालू, वह गया तेरा खजाना तरंग ताली बजाकर हंस दी । मालू उस सारे दिन उदास रही  और तरंग मन ही मन मजा लेती रही।
पहले का इलाहाबाद कितना सुंदर था झूंसी का वह शांत धरती का ही तरंग का क्रीडांगन बना।पानी पर तैरते राजा-रानी बजरे और बिड़हर के मेले में  रेत पर तंबुओं में चल रहीं रास लीलाएं कृष्ण झुक-झुक कर राधा का मनुहार करते और राधा चेहरा घुमा लेती।
ऐसे खूबसूरत दिन फिर कभी नहीं आए।
 मां कहती थीं यहां तीन नदियां एक साथ बहती हैं  गंगा ,यमुना और सरस्वती  यमुना नीली है गंगा सफेद और सरस्वती का पानी हल्का गुलाबी दिखता है। तरंग ने सरस्वती को देखने के लिए आंखें गड़ा दीं पर सरस्वती उसे कहीं नहीं दिखाई दी। बस दो ही जलधाराएं हमेशा नजर आतीं। नीली यमुना और श्वेत गंगा। यमुना का रंग उसे वैसे ही मोहक लगता था इसलिए बचपन की यह याद वैसे ही फ्रीज होकर रह गई।
तरंग घर पहुंची तो शाम ढलने को थी भाई उसे लेने आ गया था। सबकुछ वैसा ही था कुछ भी नहीं बदला था…नदी के जल का विस्तार… डूबती शाम का सिंदूरी आकाश और स्याह होती परछाइयां। उसका मन उदास था …खाली।
पत्थर की सीढ़ियां चढ़कर वह ऊपर पहुंची तो  लैंप लिए सीता राम दिखा।इतने साल गुजर गए थे ,पर बिजली यहां तक नहीं आई थी। खाना खाकर बिस्तर पर जाते ही उसे नींद ने आ घेरा । पलकें बंद होते होते आंखों में एक भूला सा सपना सरक आया। कंदर्प…एक कोमल सा चेहरा हर समय चेहरे पर तिरती मुस्कान । चौड़ा माथा और आंखों से झांकती बौद्धिकता। तरंग को जैसा दोस्त चाहिए था बिल्कुल वैसा ही। मुहब्बत का कुछ पता नहीं चलता कब ,कहां …किससे हो जाए, पर वह घर और समाज वालों को भी ग्राह्य होना चाहिए। पता लगते ही पहले कंदर्प का  उससे मिलना बंद किया गया और फिर आनन-फानन में उसकी शादी कर दी गई।
जिंदगी की राह में कितनी नागफनियां, कितने कांटे कोई पूछने वाला नहीं।
ढेर सारे साल पीपल के  टूटे पत्तों की तरह उड़ते चले गए। जीवन  के सारे सुख मिलने के बावजूद वह कंदर्प के छिनने की पीड़ा को अपने से दूर नहीं कर पाई।
चौथे दिन की  शाम  जब शरद वकील के पास गया तो वह सीढ़ियों से नीचे उतरकर संगम तक टहलने चली गई। बादलों के पीछे आंख मिचौली खेलते सूरज को तरंग देर तक देखती रही। जिंदगी से पूछे गए ढेर सारे सवालअनुत्तरित रह गए थे।
-मां सरस्वती है तो फिर दिखती क्यों नहीं  ?
-यमुना क्या सचमुच नीली है  ?
-कंदर्प क्यों मुझसे छीन लिया गया। क्या गरीबी किसी का कुसूर होती है  ?
तरंग ने आगे बढ़ कर यमुना का पानी हाथ में लिया। हाथ में आते ही वह स्वच्छ पारदर्शी हो गया।फिर धीरे से फिसल कर नदी की नीलाहट में खो गया।
-तरंग तुम यहां हो मैं पूरे घर में तुम्हें ढूंढ आया। शरद उसे खोजता हुआ वहां तक चला आया था।
-भाई क्या यमुना सचमुच नीली है…
-मेरी बहन अब तक बड़ी नहीं हुई । उसने तरंग को बाहों में समेट लिया। वह जानता था कि बहन का वह सवाल यह नहीं था ,पर इसके पीछे जो सवाल था  वह कंदर्प को लेकर ही थाऔर जिसका कोई जवाब उसके पास नहीं था।


                                                                                                                                                                    – रेणु श्रीनिवास

आह जिंदगी …

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