मौली और मून

मौली और मून

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गर्मियों की छुट्टियां थीं और बड़ी दीदी अपने बेटे मून को लेकर आई थीं। मून इतना शरारती था कि एक मिनट भी चुप नहीं बैठता था अब तो उसे मौली का भी साथ मिल गया था। मौली बेहद शरारती थी पर मून ने अपनी शरारतों में उसे भी पीछे छोड़ दिया था। दिनभर वे दोनों मिलकर उधम मचाते रहते। घर काफी बड़ा था इसलिए वे कहीं भी शोर मचाते रहें किसी को फर्क नहीं पड़ता था। आज मौली उसे अपने खेल घर में लेकर आई थी जहां उसके नए-पुराने खिलौने रखे हुए थे। कमरे में एक-एक खिलौने को देखते हुए मून की नजर उपर रखी मिट्टी की गाड़ी पर पड़ी।
-मौली देख तो सही ऊपर कितनी अच्छी गाड़ी रखी है। क्या तू उसे उतार सकती है ?
-नहीं बहुत ऊंचाई पर है। मौली ने लापरवाही से उस बदरंग हुई खिलौना गाड़ी को देखते हुए कहा। क्या था उसमें …मिट्टी के टेढ़े-मेढ़े पहिए आगे बना हुआ किसी जानवर का सिर …जाने हिरन था कि क्या था। उसके गले में बंधी हुई मटमैली रस्सी नीचे लटक रही थी।
-देख तो सही, रस्सी तो है, इसे ही खींच लेते हैं अपने आप नीचे आ जाएगी। कहते-कहते उसने उचक कर रस्सी खींच ही ली। गाड़ी जाने कितनी धूल के साथ, ऊपर देखती मौली की नाक पर आ गिरी। मौली की नाक से खून बहने लगा। उसने आव न देखा ताव और मून का सिर पकड़ कर दीवार से लड़ा दिया। दोनों के रोने चीखने की आवाज सबके कानों में पड़ी तो वे भागे आए। अजीब हाल था मौली की नाक से बहा खून उसके चेहरे पर फैल गया था और मून के बालों में ढेर सारी धूल और कचरा था। बड़ी दीदी दोनों को पकड़ कर वहां से बाहर लाईं नहला कर उनके कपड़े बदलाए गए।
दोपहर गांव से चाचा जी आ गए और फिर गांव जाने का प्लान बन गया। सभी तैयारियां जब पूरी हो गईं तो वे लोग रिक्शे में बैठ कर नदी के किनारे पहुंचे इस पर पीपे वाला पुल था जिसे पार कर उन्हें लूपलाइन की ट्रेन पकड़नी थी जो सीधे उनके गांव के स्टेशन पर रुकती हुई आगे चली जाती थी। पुल पर पैदल चलते मून को बार-बार संभालना पड़ा क्योंकि वह उछलता-कूदता हुआ चल रहा था। उसकी देखा देखी मौली भी कूदने लगी थी। छोटी दी ने मून को एक धौल जमाई तब जा कर कहीं शांत हुआ। वह बड़ा छोटा सा स्टेशन था जहां से उन्हें ट्रेन में चढ़ना था । मून हैरान सा वहां घूमते लोगों को देख रहा था मौली भी यहां पहली बार आई थी। उसने देखा एक आदमी लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ कच्चा बैंगन मजे लेकर खा रहा था।
kids-playing-on-playground--ये बैंगन ऐसे क्यों खा रहा है? मौली ने कहा।
-उसे अच्छा लग रहा होगा मून ने लापरवाही से कहा।
ट्रेन चली तो वे दोनों खिड़कियों से झांकने लगे। सारे पेड़ उल्टी दिशा में भाग रहे थे। क्या मजा है… कहता हुआ मून तालियां बजाने लगा। दो घंटे बाद वे गांव वाले स्टेशन पर पहुंच गए।
गांव का रास्ता कच्चा था इसलिए उन्हें लेने दो बैलगाड़ियां लेकर चाचाजी के आदमी आए थे ।
-ये क्या है…? मून ने फिर सवाल किया।
-हवाई जहाज है हम इसी में जाएंगे। बड़ी दीदी ने कहा। छोटी दी हंस पड़ीं। बैलगाड़ी चली तो मून चिल्लाया ।
– अरे ये तो ठेला है। सारे लोग हंस पड़े।
-मम्मी आप मुझसे झूठ बोलते हो मैं आपके पास नहीं बैठूंगा। कहता हुआ वह छोटी दी के पास चला गया।
मासी तुम तो बहुत अच्छा गाना गाती हो बिल्कुल लता मुंगलेश्कर की तरह। मुझे गाना सुना दो वही वाला-तितली उड़ी …उड़ जो चली।
-इसे नींद आ रही है बड़ी दी ने कहा। गाना सुनते-सुनते बैलगाड़ी के हिचकोले खाते मून गहरी नींद में सो गया। मौली बाहर फैले गुए खेत देखती रही और उसे भी नींद आ गई। रात दस बजे के करीब वे लोग घर पहुंचे बच्चे सो चुके थे। उन्हें सुला दिया गया।
सुबह उठते ही मौली ने देखा आंगन में एक टोकरी में ढेर सारे चमकते बैंगन रखे हुए थे। उत्सुकता वश उसने एक बैंगन उठा लिया। उसके पीछे आए मून ने भी एक उठा लिया। दोनों सीढ़ियों पर बैठ गए। मौली ने बैंगन का एक टुकड़ा कुतर लिया।
– इसका स्वाद बेकार सा है मौली ने कहा।
-मैं अपना खा कर देखता हूं कह कर मून ने बैगन में दांत गड़ा दिए।
-छीः ये तो किसी काम का नहीं..।
-अरे क्या कर रहे हो तुम लोग…कच्चा बैंगन खा रहे हो बड़ी दीदी चिल्लाईं और उनसे छीन कर दोनों बैंगन फेंक दिए। तब तक छोटी दीदी भी आंगन में आ गई थीं।
-मौली…मून, क्यों खा रहे थे तुम ये बैंगन ….उन्होंने पूछा ।
-मासी वो जब हम आ रहे थे तो स्टेशन पर एक आदमी ऐसा ही बैंगन खा रहा था।
-अरे…वह तो पागल था और तुम..नालायक कहीं के। दोनों बहनें ठहाका मार कर हंस पड़ीं। मौली और मून दोनों ही अपनी झेंप मिटाने बाहर खेलने भाग गए।


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